Hari Kishan Sarhadi in Hindi


आजाद भारत में तो आम जनता की इच्छा है कि कोई भगत सिंह की तरह जन्म लेकर उसकी बेड़ियों को काटने का कार्य करे , उच्च आदर्शो वाले क्रान्तिकारियो की पैदावार पड़ोस के घर में हो आम जन यही चाहते है | धन्य है वो परिवार , वो माताएं जिन्होंने अपनी कोख से पैदा की संतानों को क्रांति मार्ग पर चलने को प्रेरित किया | उत्तर-पश्चिम के सीमांत प्रान्त के मर्दन जनपद के गल्ला ढेर नामक स्थान पर गुरुदास मल के पुत्र रूप में सन १९१२ में बालक हरिकिशन का जन्म हुआ था | गुरु दास मल की माँ यानि कि हरिकिशन की दादी माँ बचपन से ही क्रान्तिकारियो के किस्से कहानियो के रूप में बालक हरिकिशन को सुनाया करती थी | क्रांति का बीज परिवार ने ही बोया | क्रांति बीज को पोषित करके , हरा-भरा करके माँ भारती के कदमो में समर्पित पिता गुरुदास मल ने किया | काकोरी कांड का बड़े लगन व चाव से अध्ययन हरिकिशन ने किया | रामप्रसाद बिस्मिल व अशफाक उल्लाह खान हरिकिशन के आदर्श बन गये | दौरान-ए-मुकदमा (असेम्बली बम कांड ) भगत सिंह के बयानों ने हरिकिशन के युवा मन को झक झोर दिया | भगत सिंह को हरिकिशन अपना गुरु मानने लगे |

यह वह दौर था जब ब्रितानिया हुकूमत द्वारा पुरे देश में क्रान्तिकारियो पर दमन अपने चरम पर था | कांग्रेस के नेतागण अहिंसात्मक आन्दोलन के नाम पर क्रूर और चालाक अंग्रेजो से मानो नूराकुश्ती कर रहे थे | और तो और क्रान्तिकारियो के रास्ते में भी यही कांग्रेसी ही आ जाते थे | इन्ही परिस्थितो में क्रांतिपुत्र हरिकिशन ने पंजाब के गवर्नर ज्योफ्रे डी मोरमोरेंसी का वध करने का निश्चय किया |

पंजाब विश्विद्यालय का दीक्षांत समारोह २३ दिसम्बर , १९३० को संपन्न होना था | समारोह की अध्यक्षता गवर्नर ज्योफ्रे डी मोरमोरेंसी को करनी टी और मुख्य वक्ता डॉ राधा कृष्णन थे | अपनी पूरी तैयारी के साथ हरिकिशन भी सूट-बूट पहन कर दीक्षांत भवन में उपस्थित थे | डिक्शनरी के बीच के हिस्से को काटकर उसमे रिवाल्वर रखकर समारोह की समाप्ति का इंतज़ार करने लगे | यह ध्यान देने की बात है कि हरिकिशन को गोली चलाने की ट्रेनिंग उनके ही पिता गुरुदास मल ने स्वयं ही दी थी | हरिकिशन एक पक्के निशानेबाज बन गये थे | समारोह समाप्त होते ही लोग निकलने लगे | हरिकिशन एक कुर्सी पर खड़े हो गये और उन्होंने गोली चला दी , एक गोली गवर्नर की बांह और दूसरी पीठ को छिलती हुई निकल गयी | तब तक डॉ राधा कृष्णन गवर्नर ज्योफ्रे डी मोरमोरेंसी को बचाने के लिए उनके सामने आ गये | अब हरिकिशन ने गोली नहीं चलायी और सभा भवन से निकल कर पोर्च में आ गये | पुलिस दरोगा चानन सिंह पीछे से लपके और वे हरिकिशन का शिकार बन गये , एक और दरोगा बुद्ध सिंह वधावन ज़ख़्मी होकर गिर पड़ा | हरिकिशन अपना रिवाल्वर भरने लगे परन्तु इसी दौरान पुलिस ने उन्हें धर दबोचा | इस तरह उस समय एक ब्रितानिया शोषक-जुल्मी की जन किसने बचायी और वे कितने बड़े देशभक्त थे , यह इस घटना से समझा जा सकता है | अब हरिकिशन पर अमानवीय यातनाओ का दौर शुरु हो गया |

लाहौर के सेशन जज ने २६ जनवरी , १९३१ को हरिकिशन को मृत्यु दंड दिया | हाई कोर्ट ने भी फैसले पर मोहर लगायी | जेल में दादी ने आकर कहा — हौसले के साथ फांसी पर चढ़ना | हरिकिशन ने जवाब दिया — फिक्र मत करो दादी | शेरनी का पोता हूँ | पिता ने जेल में तकलीफ पूछने की जगह सवाल दागा — निशाना कैसे चुका ? उत्तर मिला — मैं गवर्नर के आस पास के लोगो को नहीं मरना चाहता था इसीलिए कुर्सी पर खड़े होकर गोली चलाई थी | परन्तु कुर्सी हिल रही थी | उसी जेल में भगत सिंह भी कैद थे | भगत सिंह से मिलने के लिए हरिकिशन अनशन पर बैठ गये | अनशन के नौवें दिन जेल अधिकारिओ ने भगत सिंह को हरिकिशन की कोठरी में मिलने के लिए भेजा | अपने गुरु से मिलकर हरिकिशन बहुत प्रसन्न हुये | आपके पिता गुरुदास मल को भी गिरफ्तार कर लिया गया | यातनाएं दी गयी जिससे उनकी मृत्यु हो गयी | हरिकिशन को ही छोटा भाई भगतराम सुभाष चन्द्र बोष को रहमत उल्लाह के छद्म नाम से अफगानिस्तान तक छोड़ने गया था | पूरा परिवार ही देश की आज़ादी में अपना योगदान और बलिदान देने में जुटा हुआ था |

९ जून , १९३१ को प्रातः ६ बजे लाहौर की मियां वाली जेल में इन्कलाब जिंदाबाद के नारे गुंजायमान होने लगे और फिर एक तूफान आने के बाद की खामोश छा गयी | वीर युवा हरिकिशन आज़ादी की राह पर फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया गया |

२२ वर्षीया युवा हरिकिशन ने बयान दिया था — अंग्रेजो के दमन चक्र से मेरा विश्वास अहिंसा से उठकर अशास्त्र क्रांति में द्रित हुआ है | अंग्रेज भारगवर्नर ज्योफ्रे डी मोरमोरेंसी त को कभी स्वतंत्र नहीं होने देंगे | मैं गवर्नर ज्योफ्रे डी मोरमोरेंसी को कठोर दमन के लिए उत्तरदायी मानता हूँ | दीक्षांत समारोह में गवर्नर ज्योफ्रे डी मोरमोरेंसी को दंड देना इसीलिए उचित था | उसे दण्डित होते देखने के लिए विशिष्ठ व्यक्तियों का समुदाय उपस्थित था |

आइये , इस रणबांकुरे हरिकिशन की अंतिम इच्छा भी जान लीजिये — मैं इस पवित्र धरती पर तब तक जन्म लेता रहूँ जब तक इसे स्वतंत्र ना कर दूँ | यदि मेरा मृत शरीर परिवार वालो को दिया जाये तो अंतिम संस्कार उसी स्थान पर किया जाये जहा पर शहीद भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु का संस्कार हुआ था | मेरी अस्थियाँ सतलुज में उसी स्थान पर प्रवाहित की जाये जहा उन लोगो की प्रवाहित की गयी है | लेकिन अफ़सोस ही कर सकते है कि ब्रितानिया हुकूमत ने हरिकिशन के पार्थिव शरीर को उनके परिवार को नहीं सौंपा और जेल में ही जला दिया |

ब्रितानिया हुकूमत की दरिंदगी और हिंदुस्तान के गद्दारों के नापाक इरादों के शिकार बलिदानी हरिकिशन की शहादत की बेला पर उसे अंतिम विदाई देने वाला कोई था तो सिर्फ ओस की बुँदे | मात्रभूमि की आज़ादी के मकसद में क्रांति के उच्च आदर्शो की स्थापना करने वाले सभी सेनानी अपने आत्मोसर्ग की भावना के कारण युगों युगों तक क्रान्तिकारियो के लिए प्रेरणा के पुंज बन कर क्रांति पथ को आलोकित करते रहेंगे |

Posted by Unknown Monday, October 5, 2015 0 comments

Kartar Singh Sarabha in Hindi


सरदार भगत सिंह के प्रेरणाश्रोत थे कर्तार सिंह सराभा।भगतसिंह के पास सदैव उनका चित्र रहता था,भगत सिंह के शब्दों में- यह मेरा गुरू,साथी व भाई है। गावँ सराभा जनपद लुधियाना में इकलौते पुत्र के रूप में जन्म लेने वाले माँ भारती के इस लाल की जिन्दगी का एक ही लक्ष्य,एक ही इच्छा थी-क्रान्ति।अल्पायु में ही पिताजी का देहावसान हो जाने के पश्चात् दादा की स्नेहिल छावं में आपका पालन-पोषण हुआ।नवीं कक्षा के बाद आपने अपने चाचा के घर रहकर दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की।

1910-1911 के वक्त आप कॉलेज में दाखिला लिये।यह आन्दोलन का समय आपके भीतर देशप्रेम की भावना को अंकुरित करने में सहायक सिद्ध हुआ।1912 में आप सान्फ्रान-सिस्को-अमेरिका पॅंहुचे। गोरों की जबान से डैम हिन्दू और ब्लैक मैन आदि सुनते ही सुनते ही वे पागल हो जाते।भारत की इज्जत,सम्मान की धज्जियां उधड़ते देखना उनका कोमल मन सहन नहीं कर पाता।घर-परिवार की याद आने पर गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ अपना देश भारत नजर आता।यह असम्भव था कि कर्तार सिंह सराभा को चैन मिलता।

आज भारत की जो दुर्दषा है वो अपने ही धरा के लोगों के कारण है परन्तु उस समय गुलामी का अतिरिक्त दंश कोढ में खाज का कार्य कर रहा था।मन में विचार आया कि यदि शान्ति से, ब्रितानिया हुकूमत के आगे गिड़गिड़ाने से मुल्क आजाद न हुआ तो देश किस तरह से आजाद होगा?फिर किशोर सराभा क्रान्ति के पथ पर चलने का दृढ़ निश्चय करके,अपना सर्वस्व भारत माँ को अर्पण करने की ठानकर, भारतीय मजदूरों के बीच क्रान्ति की भभूत का वितरण करने में लग गया।भारत की आजादी किस राह से लायी जाये इस पर सराभा ने गहरा मनन् किया था। अपमान की,गुलामी की जिन्दगी से मौत हजार दर्जा अच्छी-यह मूलमंत्र हर मजदूर के मन में आत्मसात करा रहे थे क्रान्ति पथ प्रदर्शक कर्तार सिंह सराभा। मई 1912 में एक गुप्त बैठक आयोजित की गई। प।जाब के देशभक्त भगवान सिंह वहां पहुंचे ।लगातार जनसम्पर्क व जलसे आयोजित हुए।नवम्बर 1913 में गदर का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ।गदर हैण्ड प्रेस पर छापा जाता था।कर्तार सिंह सराभा मतवाले नौजवान थे।प्रेस चलाते2 थक जाने पर वे गाने लगते थे-

सेवा देश दी जिन्दड़िए बड़ी औखी, गल्लां करनीआँ ढेर सुखल्लीयाँ ने।
जिन्ना देशसेवा विच पैर पाया,
उन्नां लक्ख मुसीबतां झल्लियां ने।

करतार सिंह न्यूयार्क में विमान कम्पनी में कार्य करने लगे।सितम्बर 1914 में कामागाटारू जहाज प्रकरण के प्श्चात् कर्तार सिंह,क्रान्तिप्रिय गुप्ता और एक अमेरिकी क्रान्तिकारी जैक एक साथ जापान आये और बाबा गुरदित्त सिंह से मुलाकात कर योजनायें बनाई।प्रचार युद्ध को तेज किया गया।स्टारकन के पब्लिक जलसे में क्रान्तिपुत्रों ने आजादी और बराबरी की कसमें खायीं एवं आजादी का झण्डा फहराया।सभी क्रान्तिकारियों ने भारत लौटने का संकल्प लिया।

चलो चलें देश के लिए युद्ध करने,
यही आखिरी वचन और फरमान हो गये।

कर्तार सिंह गजब के उत्साही और जोशीले थे। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वे अमेरिका से भारत आये।दिसम्बर 1914 में मराठा नौजवान विष्णु पिंगले भी आ गये।इनकी कोशिश से श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल और श्री रासबिहारी बोस आये।क्रान्तिकारी योद्धा रासबिहारी बोस के साथ मिलकर कर्तार सिंह सराभा ने सम्पूर्ण भारत में पुनः एक बार गदर करने की योजना बनाई।तारीख तय हुई 21 फरवरी 1915।भारतीय फौजों को अपने पक्ष में करना एक बहुत बड़ा काम था।हथियार,गोलाबारूद,काफी धन सभी वस्तुओं का योजनापूर्वक प्रबन्ध किया।देश के सभी क्रान्तिपुत्रों में जोश की लहर दौड़ पडी।सर्वत्र संगठन किया जाने लगा!

गदर पार्टी के सारे कार्य सुनियोजित ढ़ग से होते थे।21 फरवरी 1915 को बर्मा,सिंगापुर समेत सारे भारत में क्रान्ति होनी थी,लेकिन होनी को कुछ और मंजूर था।पंजाब पुलिस का जासूस सैनिक कृपाल सिंह क्रान्तिकारियों की पार्टी में शामिल हो चुका था।पैसे के लिए उसने अपना जमीर बेच दिया।तैयारी की सूचना उसने अंग्रजों को दे दी। परिणामस्वरूप समस्त भारत में धरपकड़,तलाशियां और गिरफतारियां हुईं। अनेक क्रान्तिकारी गिरफतार हुए,कुछ भूमिगत हुए,तो कुछ काबुल की तरफ निकल गये। विफल होने की ऐसी स्थिति में रासबिहारी बोस मायूस होकर लाहौर के एक मकान में लेटे थे।कर्तार सिंह भी वहीं चारपाई पर आकर दूसरी तरफ मुहॅं करके लेट गये।दोनो ने आपस में कोई बात नहीं की,लेकिन चुपचाप ही एक दूसरे के हालात समझ गये होंगें।इनके हालात का अनुमान हम क्या लगा सकते हैं-

दरे-तदबीर पर सर फोड़ना शेवः रहा अपना,
वसीले हाथ ही न आये किस्मत आजमाई के।

कर्तार सिंह सराभा की इच्छा थी कि आजादी मिले या लड़ते-लड़ते मौत।वे फिर अलख जगाने निकल पड़े।सरगाोधा के नजदीक चक्क नम्बर 5 में पहुँच कर उन्होंने विद्रोह की चर्चा छेडी़।आप यहा पर पकड़ लिए गये।मस्त मौला कर्तार सिंह के आर्कषक व्यक्तित्व से सभी प्रभावित होते थे।मुकदमा चला।साढ़े अठारह वर्ष की उम्र थी।सबसे कम उम्र के क्रान्तिकारी थे सराभा।आपके बारे में जज ने लिखा-वह इन अपराधियों में,सबसे खतरनाक अपराधियों में एक है।अमेरिका की यात्रा के दौरान और फिर भारत में इस षड़यन्त्र का ऐसा कोई हिस्सा नहीं जिसमें इसने महत्वपूर्ण भूमिका न निभाई हो।दौरान-ए-मुकदमा आपने बयान में कहाःअपराध के लिए मुझे उम्रकैद की सजा मिलेगी या फांसी !लेकिन मैं फांसी को प्राथमिकता दूॅंगा ताकि फिर जन्म लेकर-जब तक हिन्दुस्तान आज़ाद नहीं हो,तब तक मैं बार बार जन्म लेकर,फांसी पर लटकता रहूंगा ।यही मेरी अन्तिम इच्छा हैं...

चमन ज़ारे मुहब्बत में,उसी ने बाग़बानी की,
जिसने मेहनत को ही मेहनत का समर जाना।
नहीं होता है मुहताजे नुमाइश फै़ज शबनम का,
अँधेरी रातें मोती लुटा जाती हैं गुलशन में।

डेढ़ साल तक मुकदमा चलने के पश्चात् 16 नवम्बर 1915 के दिन कर्तार सिंह सराभा को विष्णु गणेश पिंगले,बख्शीश सिंह,सुरेन सिंह वल्द बूटासिंह,सुरेन सिंह वल्द ईश्वर सिंह,हरनाम सिंह और जगत सिंह के साथ फांसी पर चढ़ा दिया गया।दस पौण्ड वजन बढ़ गया था। प्रसन्नचित्त सराभा भारत माता का जयकारा लगाते हुए क्रान्ति-पथ को आलोकित कर सरदार भगतसिंह जैसा अनुयायी भारत माँ की सेवा के लिए तैयार कर,मेहनतकश-मज़लूमों की आवाज बनने के लिए,गुलामी की बेड़िया। तोड़ने के लिए हमारे बीच छोड़ गया।।।।

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Vinoba Bhave in Hindi


संत विनोबा भावे का वास्‍तविक नाम था विनायक नरहरि भावे। उनकी समस्‍त जिंदगी साधु संयासियों जैसी रही, इसी कारणवश वह एक संत के तौर पर प्रख्‍यात हुए। वह एक अत्‍यंत विद्वान एवं विचारशील व्‍यक्तित्‍व वाले शख्‍स थे। महात्‍मा गॉंधी के परम शिष्‍य जंग ए आजा़दी के इस योद्धा ने वेद, वेदांत, गीता, रामायण, कुरान, बाइबिल आदि अनेक धार्मिक ग्रंथों का उन्‍होने गहन गंभीर अध्‍ययन मनन किया। अर्थशास्‍त्र, राजनीति और दर्शन के आधुनिक सिद्धांतों का भी विनोबा भावे ने गहन अवलोकन चिंतन किया। गया।

जेल में ही विनोबा ने 46 वर्ष की आयु में अरबी और फारसी भाषा का अध्‍ययन आरम्‍भ किया और कुरान पढना भी शुरू किया। अत्‍यंत कुशाग्र बुद्धि के विनोबा जल्‍द ही हाफि़ज़ ए कुरान बन गए। मराठी, संस्‍कृत, हिंदी, गुजराती, बंगला, अंग्रेजी, फ्रेंच भाषाओं में तो वह पहले ही पारंगत हो चुके थे। विभिन्‍न भाषाओं के तकरीबन पचास हजार पद्य विनोबा को बाकायदा कंठस्‍थ थे। समस्‍त अर्जित ज्ञान को अपनी जिंदगी में लागू करने का भी उन्‍होने अप्रतिम एवं अथ‍क प्रयास किया।

महात्‍मा गॉंधी ने उनकी असल शक्ति को पहचाना। विनायक हरि भावे से प्रथम बार मिलने के पश्‍चात बापू ने कहा कि तुम्‍हारे प्रेम, ज्ञान और चारित्र्य की ताकत ने मुझे मोहित कर लिया है। तुम निश्चित तौर पर महान् कार्य का निमित्‍त बनोगे। ईश्‍वर तुम्‍हें दिर्घायु करे और तुम हिंद की आज़ादी और प्रगति के लिए अपना जीवन अर्पित कर दो। दीनबंधु एंड्रयूज को महात्‍मा गॉंधी ने एक खत में लिखा था कि लोग आश्रम में कुछ ना कुछ पाने के लिए आते हैं, किंतु विनोबा तो आश्रम को अपने पुण्‍यों के प्रताप से सिंचित करने आया है। आश्रम के दुर्लभ रतनों में वह एक है।

विनोबा का जन्‍म महाराष्‍ट्र के कोंकड़ इलाके के गागोद गॉव में 11 सितंबर 1895 को हुआ। पिता नरहरि भावे ने नवजात शिशु का नाम रखा विनायक। घर का वातावरण भक्तिभाव से ओतप्रोत था। बाल्‍यपन से ही वैरागी बनने का विचार दृढ़ होने लगा। विनोबा की मां रखुबाई के निर्देशन में बालक विनायक का उपनिषद, गीता, रामायण, और महान् मराठी संतों के धर्मग्रंथों का पठन पाठन चलता ही रहता था।

विनायक की बुद्धि अत्‍यंत प्रखर थी। गणित उसका सबसे प्‍यारा विषय बन गया। हाई स्‍कूल परीक्षा में गणित में सर्वोच्‍च अंक प्राप्‍त किए। बडौ़दा में ग्रेजुएशन करने के दौरान ही विनायक का मन वैरागी बनने के लिए अति आतुर हो उठा। 1916 में मात्र 21 वर्ष की आयु में गृहत्‍याग कर दिया और साधु बनने के लिए काशी नगरी की ओर रूख किया। काशी नगरी में वैदिक पंडितों के सानिध्‍य में शास्‍त्रों के अध्‍ययन में जुट गए। गॉधी बाबा की चर्चा देश में चारो ओर चल रही थी कि वह दक्षिणी अफ्रीका से भारत आ गए हैं और आजादी का बिगुल बजाने में जुट गए हैं। अखंड स्‍वाध्‍याय और ज्ञानाभ्‍यास के दौरान विनोबा का मन गॉ्धी बाबा से मिलने के लिए किया तो वह पंहुच गए अहमदाबाद के कोचरब आश्रम में। जब पंहुचे तो गॉधी सब्‍जी काट रहे थे। इतना प्रख्‍यात नेता सब्‍जी काटते हुए मिलेगा, ऐसा तो कदाचित विनाबा ने सोचा न था। बिना किसी उपदेश के स्‍वालंबन और श्रम का पाठ पढ लिया। इस मुलाकात के बाद तो जीवन भर के लिए वह बापू के ही हो गए।

बापू के सानिध्‍य और निर्देशन में विनोबा के लिए ब्रिटिश जेल एक तीर्थधाम बन गई। सन् 1921 से लेकर 1942 तक अनेक बार जेल यात्राएं हुई। सन् 1922 में नागपुर का झंडा सत्‍याग्रह किया। ब्रिटिश हुकूमत ने सीआरपीसी की धारा 109 के तहत विनोबा को गिरफ्तार किया। इस धारा के तहत आवारा गुंडों को गिरफ्तार किया जाता है। नागपुर जेल में विनोबा को पथ्‍थर तोड़ने का काम दिया गया। कुछ महीनों के पश्‍चात अकोला जेल भेजा गया। विनोबा का तो मानो तपोयज्ञ प्रारम्‍भ हो गया। 1925 में हरिजन सत्‍याग्रह के दौरान जेल यात्रा हुई। 1930 में गॉधी की कयादत में राष्‍ट्रीय कांग्रेस ने नमक सत्‍याग्रह अंजाम दिया गया।

12 मार्च 1930 को गॉंधी ने दाण्‍डी मार्च शुरू किया। विनोबा फिर से जेल पंहुच गए। इस बार उन्‍हे धुलिया जेल रखा गया। राजगोपालाचार्य जिन्‍हे राजाजी भी कहा जाता था, उन्‍होने विनोबा के विषय में यंग इंडिया में लिखा था कि विनोबा को देखिए देवदूत जैसी पवित्रता है उसमे। आत्‍मविद्वता, तत्‍वज्ञान और धर्म के उच्‍च शिखरों पर विराजमान है वह। उसकी आत्‍मा ने इतनी विनम्रता ग्रहण कर ली है कि कोई ब्रिटिश अधिकारी यदि पहचानता नहीं तो उसे विनोबा की महानता का अंदाजा नहीं लगा सकता। जेल की किसी भी श्रेणी में उसे रख दिया जाए वह जेल में अपने साथियों के साथ कठोर श्रम करता रहता है। अनुमान भी नहीं होता कि य‍ह मानव जेल में चुपचाप कितनी यातनाएं सहन कर रहा है।

11 अक्‍टूबर 1940 को गॉंधी द्वारा व्‍यक्तिगत सत्‍याग्रह के प्रथम सत्‍याग्रही के तौर पर विनोबा को चुना गया। प्रसिद्धि की चाहत से दूर विनोबा इस सत्‍याग्रह के कारण बेहद मशहूर हो गए। उनको गांव गांव में युद्ध विरोधी तक़रीरें करते हुए आगे बढते चले जाना था। ब्रिटिश सरकार द्वारा 21 अक्‍टूबर को विनोबा को गिरफ्तार किया गया। सन् 1942 में नौ अगस्‍त को वह गॉधी और कॉंग्रेस के अन्‍य बडे़ नेताओं के साथ गिरफ्तार किया गया। इस बार उनको पहले नागपुर जेल में फिर वेलूर जेल में रखा।

1948 में गॉंधी जी की हत्‍या के पश्‍चात विनोबा ने सेवाग्राम में देशभर के गॉंधीवादियों के साथ मिलकर सर्वोदय समाज और सर्व सेवा संघ की स्‍थापना की। पवनार आश्रम के इस प्रयोगवादी बाबा ने कांचन मुक्ति का प्रयोग भी किया। अर्थात अपने कडे़ श्रम के आधार पर प्राप्‍त अन्‍न और वस्‍त्र के आधार पर ही जीवन यापन करना। सन् 1951 में भूदान यज्ञ आंदोलन का आग़ाज़ विनोबा भावे ने किया। उल्‍लेख्‍नीय है कि 1946 में आंध्र प्रदेश के तेलंगाना इलाके में साम्‍यवादियों ने सामंतवादी जमींदारी के विरूद्ध भयावह हिंसक संघर्ष की शुरूआत की। तकरीबन तीन सौ बडे़ जमींदारों को कत्‍ल कर दिया गया। विनोबा इस हिंसा से अत्‍यंत विचलित हुए और उन्‍होने भूदान यज्ञ आंदोलन का आग़ाज़ किया।

18 अप्रैल 1951 का दिन और आंध्र प्रदेश का पोचमपल्‍ली गांव, विनोबा के समक्ष गांव के भूमिहीन दलितों ने 80 बीघा जमीन की मांग पेश की। सांयकाल प्रार्थनासभा में विनोबा ने ग्रामीणों से सहज भाव से पूछा कि दलितों का जमीन चाहिए और सरकार तो अभी बहुत समय लगेगा इनको जमीन मुहैया कराने में। क्‍या आप भी कुछ कर सकते है। रामचंद्र रेड्डी नामक जमींदार खडा़ हुआ और अपनी पचास एकड़ जमीन देने के लिए तैयार हो गया। बिनोबा को रास्‍ता मिल गया, उन्‍होने गांव गांव घूम घूम कर जमीन मांगने और उसे भूमिहीन दलितों में वितरित करने का संकल्‍प ले लिया। कुछ इसे तरह से ही भूदान यज्ञ की गंगोत्री निकल पडी़। देश भर में विनोबा की भूदान यज्ञ आंदोलन की गांव गांव पदयात्रा निरंतर 13 वर्षो तक जारी रही। वह कहा करते यह प्रजासूय यज्ञ है और मैं इसका अश्‍व हूं और गांव गांव अहिंसा की फतह के लिए घूम रहा हूं भूमिदान मांगते हुए।

जयप्रकाश नारायण जैसे प्रबल राजनेता ने विनोबा की पांतो में जाना स्‍वीकार लिया। विश्‍वनाथ प्रताप सिंह विनोबा के अनुयायी बने। इस चिरंतन भूदान यात्रा के दौरान ही 19 मई 1960 को चंबल के खुंखार बागी डाकूओं का आत्‍मसमर्पण भी करा दिया। मानसिंह गिरोह के 19 डाकू विनोबा की शरण आ गए। आजादी हासिल होने पश्‍चात विनोबा ने राजनीति से पूर्णत: मुख मोड लिया था। अपने इस संकल्‍प पर वह सदैव कायम रहे। 1974 में जयप्रकाश नारायण के सरकार विरोधी राजनीतिक आंदोलन कमान संभालने पर भी वह राजीनीति से उदासीन बने रहे। जीवन के अंतिम दौर में उन्‍होने गौवंश की हत्‍या पर प्रतिबंध आयद करने के लिए पुरजोर कोशिश की। 15 नवंबर 1982 को इस महान् तेजस्‍वी संत ने पवनार आश्रम में अंतिम सांस ली और एक परम पुण्‍य जीवन खत्‍म हुआ।

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Rani Laxmi Bai in Hindi


19 नवम्बर 1835 को मोरोपंत व भागीरथीबाई की संतान रूप में एक बालिका ने जन्म लिया। काशी में जन्मी इस बालिका का नाम मणिकर्णिका रखा गया। प्यार से इस बालिका को सभी मनु पुकारने लगे। मोरोपंत जी सतारा जिले के वाई गाँव में चिमाजी आप्पा के यहाँ नौकरी करते थे। चिमाजी आप्पा पूना के पेशवा बाजीराव के भाई थे। सन्1818 में अंग्रेजों के पूना कब्जे के पश्चात् बाजीराव पेशवा बिठूर-कानपुर आ गये ।चिमाजी आप्पा के देहान्त के पश्चात् मोरोपंत,बाजीराव पेशवा के यहाँ बिठूर आ गये। बाजीराव के दत्तक नानासाहब के साथ मनु ने बचपन में ही शस्त्र विद्या व घुड़सवारी का प्रशिक्षण ले लिया था। बाजीराव मनु को छबीली कहते थे। बाजीराव ने ही आठ वर्षीया मनु का विवाह झाँसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर से कराया था। अब मनु झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई हो गई ।

गंगाधर राव के पूर्वजों को झाँसी का राज्य महाराजा छत्रसाल से उपहार रूप में प्राप्त हुआ था। सन 1851को सोलह वर्षीया रानी लक्ष्मीबाई को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। कुछ ही दिनों पश्चात् यह नवजात शिशु मृत्यु के आगोश में समा गया। विधाता के इस फैसले को गंगाधर राव सह न सके और वे बीमार पड़ गये। गंगाधर राव ने बीमारी की परिस्थिति को समझकर अपने सम्बन्धी वासुदेवराव के पुत्र आनन्द को गोद लेकर उसका नाम दामोदर राव रख दिया। 21नवम्बर 1853 को गंगाधर राव का स्वर्गवास हो गया। अंग्रेज तो मानो इसी दिन की प्रतीक्षा ही कर रहे थे,उन्होने दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी रूप में अस्वीकार कर दिया और गंगाधर राव की लाखों की सम्पत्ति को अपने खज़ाने में जमा कर लिया। 7मार्च,1857 को शासन व्यवस्था के लिए अंग्रेज प्रतिनिधि एलिस को नियुक्त करके झाँसी को अंग्रेजी हुकूमत में शामिल कर लिया। अपमानित करते हुए वायसराय डलहौजी ने रानी लक्ष्मीबाई से किला खाली करवा लिया और 5000रू मासिक पेंशन बहाल कर दी। रानी को पारम्परिक केशवपन संस्कार के लिए काशी जाने की इजाजत नही दी गई। दामोदर राव के यज्ञोपवीत संस्कार के लिए जमा दस लाख रूपयों में से बडी मुश्किल से एक लाख रूपये,एक व्यापारी की जमानत से मिले।

अंग्रेजों के अन्याय-अत्याचार व जुल्म का प्रतिकार लेने के उद्देश्य से रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी युद्ध की तैयारी प्रारम्भ कर दी। स्त्री गुप्तचरों की टोली बना,अंग्रेज छावनियों से गुप्त समाचार लाने की जिम्मेदारी दी। स्त्री-सैनिकों में वृद्धि की। तात्या टोपे ने सम्पूर्ण भारत में चलाई जा रही क्रान्ति की योजनाओं से रानी लक्ष्मीबाई को अवगत कराया। रानी को मानो मन की मुराद मिल गई। 31मई, 1857 का दिन स्वतन्त्रता-संग्राम के उद्घोश के लिए निर्धारित किया गया था। परन्तु मेरठ छावनी के 85 वीरों ने चर्बी वाले कारतूसों के इस्तेमाल से मनाही कर दी। वे जेल में डाल दिये गये थे। 10 मई1857 को घुड़सवार और पैदल सेना ने जाकर जेल तोड़ दी, अपने साथियों को छुड़ा लिया,अफसरो के घरों को फूक डाला। जिस यूरोपीय को पकड़ पाये,उसे मार डाले और दिल्ली की ओर चढ़ाई कर दी। यह घटना पूरे भारत में आग की तरह फैल गई। सम्पूर्ण उत्तर-भारत में मई माह में ही क्रान्ति की लपटें अंग्रेजों को दहलाने लगी।

5जून1857 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के स्टार फोर्ट नामक छोटे से किले पर सैनिकों ने हमला कर लूट लिया। झाॅंसी में अंग्रेज अफसरों के बंग्ले जला दिये गये। अंग्रेज अपनी स्त्रियों व बच्चों को रानी के पास महल में शरण हेतु ले कर आ गये। धन्य है-वो नारी-वीरांगना,जिसने अंग्रेजों द्वारा अत्याचारित होने के बावजूद राजधर्म व मानवता धर्म का त्याज्य नहीं किया। बाद में ये अंग्रेज परिवार किले में जा बसे। वहाॅं भी भूख-प्यास से तड़पते परिवारों के लिए रानी ने भोजन भिजवाया। किले की लड़ाई में अंग्रेज अधिकारी गार्डन मारा गया तथा रानी के रिसालदार काले खाॅं ने किला फतह किया। इसके बाद टीकमगढ़ के दीवान नत्थू खाॅं ने अंग्रेजों के इशारे पर बीस हजार सैनिकों के साथ झाॅंसी पर आक्रमण किया। रानी ने उसे भी परास्त किया ।रानी लक्ष्मीबाई ने धैर्य,साहस को संजोकर और न्यायपूर्वक राज्य को चलाना प्रारम्भ किया। सैन्य संगठन को फिर से सुदृढ़ किया।धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की चहल पहल प्रारम्भ हो गई।रानी की सेना में दस हजार बंुदेले,अफगान और असंतुष्ट अंग्रेज थे।

चार सौ घुड़सवारों से सुसज्जित सेना के सेनापति जवाहरसिंह बुन्देला तथा दुर्गा दल नामक स्त्री सैन्य दल की प्रमुख वीरांगना झलकारी बाई थीं।गोलंदाज गुलाम गौस के निर्देशन में तोपखाना था,जिसमें महिलाओं को भी तोप चलाने का विशेष प्रशिक्षण दिया गया था।वाणपुर के राजा मर्दन सिंह,शाह गढ़ के बख्त अली ने रानी को पर्याप्त सहायता दी।दस एक माह बाद ह्यरोज और बिटलाक ने अंग्रेजी फौज लेकर रायगढ़,चंदेरी,सागर,वाणपुर आदि को जीतते हुए 23मार्च,1858 को झांसी किले को घेर लिया।तात्या टोपे कालपी से रानी की सहायता के लिए निकले परन्तु अंग्रेजों को रानी के गद्दारों से इसकी भनक मिल गई एवं अंग्रेजों ने रास्ते में तात्या टोपे की सेना पर आक्रमण कर दिया।झांसी किले के चारों प्रवेश दार पर कुशल तोपचियों की तैनाती थी।अंग्रेजों ने ओरक्षा प्रवेश दार पर नियुक्त दुल्हाजू को,पीरबख्श के हाथों रिश्वत देकर,गद्दारी के लिए तैयार कर लिया।उसने अपना प्रवेश दार खोल दिया।

उन्नाव प्रवेश दार रानी की प्रिय सहेली तथा दुर्गा दल की प्रमुख झलकारी बाई का पति पूरण सिंह तैनात था।अंग्रेजों ने किले में प्रवेश करते ही उसे मौत के घाट उतार दिया।पति की मृत्यु का शोक करने के बजाए वीरांगना झलकारी बाई ने कूटनीतिक चाल चली।रानी लक्ष्मी बाई को दत्तक पुत्र दामोदर राव के साथ साधारण वेष में बाहर निकाला तथा स्वयं रानी का रूप धारण कर साक्षात चण्डी का अवतार बन गई।झलकारी बाई ने अब अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था अंग्रेजों को अधिकतम समय तक स्वयं में उलझाये रखना जिससे कि रानी सकुशल कालपी पहुॅंच जायें।एक बार फिर दुल्हाजू ने गद्दारी की,उसने अंग्रेजों को हकीकत बता दी।अब अंग्रेजों ने रानी का पीछा करना प्रारम्भ किया।झांसी में पन्द्रह हजार लोगों को अंग्रेजों ने मार डाला।करोड़ों की सम्पत्ति लूटी।सत्रह दिन तक चले इस युद्ध में झांसी तबाह हो गया।

इघर रानी कालपी पहुची।वहां राव साहब पेशवा और तात्या टोपे ने उनका स्वागत किया।कालपी से ये लोग ग्वालियर आ गये।जनता व सेना ने राव साहब पेशवा का राजतिलक किया तथा रानी युद्ध की तैयारी में आस पास के ठिकानों का भ्रमण करने लगी।ग्वालियर के सिंधिया राजघराने ने अंग्रेजों के आगे घुटने टेक दिये।ह्यूरोज विशाल सेना लेकर ग्वालियर आ धमका।मुरार में उसकी टक्कर तात्या टोपे से हुई।भयंकर युद्ध प्रारम्भ हो चुका था।18जून,1858 का वो दिन भी आ गया जिस दिन विधाता ने रानी लक्ष्मी बाई की शहादत की तारीख तय कर रखी थी।काशी और सुन्दर नाम की विश्वस्त सहेलियों के साथ रानी चारों तरफ से अंग्रेजों से घिर गई थी।रानी की तलवार बाजी से हार कर अंग्रेजों ने तोपों का मुंह खोल दिया।

रानी के सैनिक मारे गये,घोड़े की भी एक टांग टूट गई।रानी दूसरे घोड़े पर सवार होकर दोनो हाथों से तलवार चलाती हुई,मुंह में घोड़े की रस्सी दबाये अंग्रेजों को चीरते हुए निकलने में कामयाब हो गई।रास्ते में बड़ा नाला था,घोड़ा नया होने के कारण बीच में ही फंस गया।अंग्रेजों ने रानी पर गोलियां बरसानी प्रारम्भ कर दी।गोली से घायल रानी के पीछे सिर पर अंग्रेज ने तलवार से वार किया।रानी इस समय कालस्वरूपा हरे गई थी।बुरी तरह घायल रानी ने दर्जन भर अंग्रेज मार डाले।अंग्रेज पीछे हटे और लड़ते लड़ते रानी लक्ष्मी बाई मातृभूमि की गोद में सदा के लिए सो गईं।आज उनका जीवन संधर्ष,बलिदान गाथा,प्रशासनिक क्षमता प्रेरक है हमारे लिए और उन्हें मातृशक्ति के रूप में हम अपने ह्दय में संजोयें हुए हम उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

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Nathuram Vinayak Godse Indian Freedom Fighters in Hindi


अपने अन्तिम शब्दों में "नाथूराम विनायक गोडसे" ने कहा था: "यदि अपने देश और धर्म के प्रति भक्तिभाव रखना कोई पाप है तो मैंने वह पाप किया है और यदि यह पुण्य है तो उसके द्वारा अर्जित पुण्य पद पर मैं अपना नम्र अधिकार व्यक्त करता हूँ"

गान्धी-वध के मुकद्दमें के दौरान न्यायमूर्ति खोसला से नाथूराम ने अपना वक्तव्य स्वयं पढ़ कर सुनाने की अनुमति माँगी थी और उसे यह अनुमति मिली थी। नाथूराम गोडसे का यह न्यायालयीन वक्तव्य भारत सरकार द्वारा प्रतिबन्धित कर दिया गया था। इस प्रतिबन्ध के विरुद्ध नाथूराम गोडसे के भाई तथा गान्धी-वध के सह-अभियुक्त गोपाल गोडसे ने ६० वर्षों तक वैधानिक लडाई लड़ी और उसके फलस्वरूप सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रतिबन्ध को हटा लिया तथा उस वक्तव्य के प्रकाशन की अनुमति दी।
नाथूराम गोडसे ने न्यायालय के समक्ष गान्धी-वध के जो १५० कारण बताये थे उनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं: -

(१) अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (१९१९) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के नायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाये।गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से स्पष्ठ मना कर दिया।

(२) भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था,कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचायें, किन्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकारकर दिया।

(३) ६ मई १९४६ को समाजवादी कार्यकर्ताओं को दिये गये अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।

(४) मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए १९२१ में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग १५०० हिन्दू मारे गये व २००० से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।

(५) १९२६ में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द की अब्दुल रशीद नामक मुस्लिम युवक ने हत्या कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वर गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिये अहितकारी घोषित किया।

(६) गान्धी ने अनेक अवसरों पर शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोबिन्द सिंह को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।

(७) गान्धी ने जहाँ एक ओर कश्मीर के हिन्दू राजा हरि सिंह को कश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दू बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।

(८) यह गान्धी ही थे जिन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।

(९) कांग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिये बनी समिति (१९३१) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गान्धी की जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।

(१०) कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टाभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहे थे, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पद त्याग दिया।

(११) लाहौर कांग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।

(१२) १४-१५ १९४७ जून को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुँच कर प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।

(१३) जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे; ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और १३ जनवरी १९४८ को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।

(१४) पाकिस्तान से आये विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।

(१५) २२ अक्तूबर १९४७ को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउण्टबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को ५५ करोड़ रुपये की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।

गाँधी अहिंसा अपनाने को तो कहते थे पर सिर्फ हिन्दुओ से उनके इन्ही दोहरे मापदंडो के कारन दुखी होकर "नाथूराम विनायक गोडसे" ने उनकी हिंसात्मक म्रत्यु कर दी

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एक देशभक्त की रोमांचक गाथा- जिन्होंने आजाद भारत में भी जेल काटी

१९४७ का भारत आज का भारत नहीं था अपितु विदेशी अंग्रेजों की गुलामी के तले भारत के वासी बंधुत्व का जीवन जीने को मजबूर थे. सामान्य लोगों में तो जन आक्रोश था ही फौज के साधारण सैनिकों में भी असंतोष धीरे धीरे पनप रहा था. २२ अप्रैल १९३० को दोपहर के समय पेशावर के परेड मैदान में समक्ष सभी जमा सैनिकों के समक्ष अंग्रेज अधिकारी ने आकर कहाँ की हमे अभी पेशावर शहर में ब्रिगाड़े ड्यूटी के लिए जाना होगा. पेशावर शहर में ९७ % मुस्लमान हैं और वे अल्पसंख्यक हिंदुयों पर अत्याचार कर रहे हैं. गढ़वाली सेना को पेशावार जाकर अमन चैन कायम करना होगा. यदि जरुरत पड़ी तो मुसलमानों पर गोली भी चलानी होगी. आज़ादी के संघर्ष को खत्म करने के लिए , उसे मज़हबी रंग देने के लिए अंग्रेजों ने एक निति बनाई की जिन इलाकों में मुसलमान ज्यादा होते तो उनमे हिन्दू सैनिकों की तैनाती करते और जिन इलाकों में हिन्दू ज्यादा होते तो उनमें मुसलमान सैनिकों की तैनाती करते थे. चन्द्र सिंह गढ़वाली अंग्रेजों की इस कूटनीति को समझ गए. उन्होंने अपने सैनिकों से कहाँ “ब्रिटिश सैनिक कांग्रेस के आन्दोलन को कुचलना चाहते हैं.क्या गढ़वाली सैनिक गोली चलने के लिए तैयार हैं? ” पास खड़े सबी सैनिकों ने कहाँ की कदापि नहीं हम अपने निहत्थे भाइयों पर कभी गोली नहीं चलायेंगे.

अंग्रेज सरकार ने सैनिकों के बैरकों पर नीति से चिपकाया हुआ था की जो भी फौजी बगावत करेगा उसे यह सजा दी जाएगी

१. उसे गोली से उदा दिया जायेगा

२. उसे फाँसी दे दी जाएगी

३. खती में चूना भरकर उसमें बागी सिपाही को खड़ा किया जायेगा और पानी डालकर जिन्दा ही जला दिया जायेगा

४. बागी सैनिकों को कुत्तों से नुचवा दिया जायेगा

५. उसकी सब जमीन जायदाद छिनकर उसे देश से निकला दे दिया जायेगा

इस सख्त नियम के होने के बावजूद गड्वाली सैनिकों ने अंग्रेजों का साथ न देने का मन बना लिया .

पेशावर के किस्सा खानी बाज़ार में २० हज़ार के करीब निहत्थे आन्दोलनकारियों की भीड़ विदेशी शराब और विलायती कपड़ों की दुकानों पर धरना देने के लिए आये थे.एक गोरा सिपाही बड़ी तेज़ी से मोटर साइकिल पर भीड़ के बीच से निकलने लगा जिससे कई व्यक्तियों को चोटे आई.भीड़ ने उत्तेजित होकर मोटर साइकिल में आग लगा दी जिससे गोरा सिपाही घायल हो गया. अंग्रेज अधिकारी ने उत्तेजित होकर कहाँ गढ़वाली थ्री रौंद फायर.अंग्रेज अधिकारी के आदेश के विरुद्ध चन्द्र सिंह गढ़वाली की आवाज़ उठी. गढ़वाली सीज फायर!

सभी गड्वाली सैनिकों ने हथियार भूमि पर रख दी. सभी सैनिकों को बंदी बनाकर वापिस बैरकों में लाया गया. सभी सैनिकों ने अपना इस्तीफा दे दिया और कारन बताया की हम हिन्दूस्तानी सिपाही हिंदुस्तान की सुरक्षा के लिए भारती हुए हैं न की निहत्थी जनता पर गोलियां चलने के लिए.१३ जून १९३० को एबटाबाद मिलिटरी कोर्ट में कोर्ट मार्शल में हवलदार मेजर चन्द्र सिंह को आजीवन कारावास , सारी जायदाद जब्त की सजा सुनाई गयी.७ सैनिक सरकारी गवाह बनकार छुट गए. बाकी ६० में से ४३ सैनिकों की नौकरी, जमीन जायदाद जब्त कर ली गयी. चन्द्र सिंह २६ अक्टूबर १९४१ को ११ साल ८ महीने की कैद काटकर ही छुटे. १९४२ के भारत छोड़ो के आन्दोलन में फिर से जुड़ गए. फिर सात साल की सजा इस केस में भी मिली.अंतत २२ अक्टूबर १९४६ को गढ़वाल वापिस लौटे. १६ साल की नौकरी के बदले मिली मात्र ३० रुपये पेंशन जिसे उन्होंने मना कर दिया और जमीन जायदाद पहले ही जब्त हो चुकी थी. अपने बाकि साथियों को सम्मानजनक पेंशन दिलवाने के लिए वे आजीवन संघर्ष करते रहे.इस अहिंसक सिपाही के पवित्र आन्दोलन को अहिंसा के पुजारी गाँधी ने बागी कहकर उनकी आलोचना करी और आज़ादी के बाद उन्हें स्थानीय चुनावों में इसलिए खड़ा नहीं होने दिया गया क्यूंकि वे फौजी कानून में सजाफ्ता थे. १९६२ में नेहरु ने उनसे कहाँ बड़े भाई आप पेंशन क्यूँ नहीं लेते. चन्द्र सिंह ने कहाँ मैंने जो कुछ भी किया पेंशन के लिए नहीं बल्कि देश के लिए किया. आज आपके कांग्रेसियों की ७० और १०० रुपये पेंशन हैं जबकि मेरी ३० रुपये. नेहरु जी सर झुकाकर चुप हो गए और फिर बोले अभी जो भी मिलता हैं उसे ले लो. चन्द्र सिंह ने कहाँ की यह कंपनी रूल के अनुसार जो ३० रूपए मासिक जो आपकी सरकार देती हैं वह न देकर मुझे एक साथ ५००० रुपये दे दिए जाये जिससे में सहकारी संघ और होउसिंग ब्रांच का कर्ज चूका सकूँ. नेहरु जी ने कहाँ की आपकी पेंशन भी बढ़ा दी जाएगी और आपको ५००० रुपये भी दे दिए जायेगे.फिर चन्द्र सिंह की फाइल उत्तर प्रदेश सरकार के पास भेज दी गयी. पर सरकारे आती जाती रही उनके कोई न्याय नहीं मिला. मिली तो आजाद भारत में एक साल की सजा.

श्री शैलन्द्र ने पांचजन्य के स्वदेशी अंक में १६ अगस्त १९९२ में चन्द्र सिंह गढ़वाली से हुई अपनी भेंट वार्ता का वर्णन करते हुए लिखा हैं – मैंने पुछा – इस आज़ादी का श्रेय फिर भी कांग्रेस लेती हैं? चन्द्र सिंह उखड़ गए. गुस्से में कहाँ – यह कोरा झूठ हैं. मैं पूछता हूँ की ग़दर पार्टी, अनुशीलन समिति, एम.एन.एच., रास बिहारी बोस, राजा महेंदर प्रताप, कामागाटागारू कांड, दिल्ली लाहौर के मामले, दक्शाई कोर्ट मार्शल के बलिदान क्या कांग्रेसियों ने दिए हैं, चोरा- चौरी कांड और नाविक विद्रोह क्या कांग्रेसियों ने दिए थे? लाहौर कांड, चटगांव शस्त्रागार कांड, मद्रास बम केस, ऊटी कांड, काकोरी कांड, दिल्ली असेम्बली बम कांड , क्या यह सब कांग्रेसियों ने किये थे.हमारे पेशावर कांड में क्या कहीं कांग्रेस की छाया थी? अत: कांग्रेस का यह कहना की स्वराज्य हमने लिया, एकदम गलत और झूठ हैं. कहते कहते क्षोभ और आक्रोश से चन्द्र सिंह जी उत्तेजित हो उठे थे. फिर बोले- कांग्रेस के इन नेतायों ने अंग्रेजों से एक गुप्त समझोता किया, जिसके तहत भारत को ब्रिटेन की तरफ जो १८ अरब पौंड की पावती थी, उसे ब्रिटेन से वापिस लेने की बजाय ब्रिटिश फौजियों और नागरिकों के पेंशन के खातों में डाल दिया गया. साथ ही भारत को ब्रिटिश कुम्बे (commonwealth) में रखने को मंजूर किया गया और अगले ३० साल तक नेताजी सुभाष चंद्रबोस की आजाद हिंद सेना को गैर क़ानूनी करार दे दिया गया. मैं तो हमेशा कहता हूँ- कहता रहूँगा की अंग्रेज वायसराय की ट्रेन उड़ाने की कोशिश कभी कांग्रेस ने नहीं की, की तो क्रांतिकारियों ने ही. हार्डिंग पर बम भी वही डाल सकते थे न की कांग्रेसी नेता. सहारनपुर-मेरठ- बनारस- गवालियर- पूना-पेशावर सब कांड क्रांतिकारियों से ही सम्बन्ध थे, कांग्रेस से कभी नहीं.

१ अक्टूबर १९७९ को ८८ वर्ष की आयु में महान क्रांतिकारी चन्द्र सिंह गढ़वाली का स्वर्गवास अत्यंत विषम स्थितियों में हुआ.

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कागज : एक राष्ट्रीय सम्पत्ति

सन २००४ के आम चुनाव भारत के लिये बेहद महत्वपूर्ण साबित हुए हैं, राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि पर्यावरणीय दृष्टिकोण से, क्योंकि विश्व के इन सबसे बडे चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (Electronic Voting Machines) का देशव्यापी उपयोग किया गया, जिसके कारण लाखों टन कागज की बचत हुई । जाहिर है लाखों टन कागज की बचत अर्थात लाखों पेड़ कटने से बच गये, पर्यावरण (Environment) की नजर से यह एक असाधारण उपलब्धि मानी जा सकती है । हम सभी जानते हैं कि कागज बनाने का सीधा सम्बन्ध वनों की कटाई से होता है, और कागज का दुरुपयोग, मतलब हमारे और खराब होते हुए पर्यावरण को एक और धक्का ।

हमारे दैनिक जीवन में, रोजमर्रा के कामकाज में, ऑफ़िसों (Offices) में, कॉलेजों (Colleges), न्यायालयों (Courts), तात्पर्य यह कि लगभग सभी क्षेत्रों में कागज का सतत उपयोग होता रहता है, होता रहेगा, क्योंकि वह जरूरी भी है । लेकिन यहाँ बात हो रही है कागज के बेरहम दुरुपयोग की । क्या कभी किसी ने इस ओर ध्यान दिया है कि हम कागज का कितना दुरुपयोग करते हैं ? कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोगों को कागज मुफ़्त में मिल रहा है, या भारत में कागज की अधिकता हो गई है । कुछ उदाहरणों से इस विकराल समस्या को समझने और उसका निराकरण करने में सहायता मिलेगी ।

सबसे पहले बात न्यायालयों की, न्यायालयों में परम्परा के तौर पर "लीगल" कागज का उपयोग होता है । इस कागज का नाम "लीगल" पडा़ ही इसीलिये कि यह न्यायिक प्रक्रिया में उपयोग होने वाला कागज है । अनजान लोगों के लिये यह बताना जरूरी है कि "लीगल" कागज, एक सामान्य "ए४" कागज से थोड़ा सा लम्बा (दो सेमी अधिक) होता है । प्रायः देखा गया है कि लम्बी-लम्बी कानूनी प्रक्रिया के दौरान, हजारों, लाखों रुपये के कागज लग जाते हैं, जो कि गवाही, सबूत, शपथपत्र आदि तमाम न्यायिक गतिविधि को देखते हुए सामान्य और स्वाभाविक है, परन्तु क्या ऐसा नहीं किया जा सकता कि कोर्ट का सारा काम "लीगल" पेपर के बजाय, "ए४" कागज पर हो, जबकि ऐसा बगैर किसी परेशानी के किया जा सकता है ।

कल्पना ही की जा सकती है कि लाखों-करोड़ों कागज यदि दो-दो से.मी. कम हो जायेंगे तो कितने टन कागज की बचत होगी । कोई भी माननीय न्यायाधीश अपनी ओर से पहल करके अपने वकीलों से कह सकता है कि मेरे द्वारा सुनवाई किये जाने वाले कागज "लीगल" नहीं बल्कि "ए४" होंगे, तो अपने-आप धीरे-धीरे सभी लोग इसे अपना लेंगे, और कागज की लम्बाई कम हो जाने से कानून पर कोई फ़र्क नहीं पडे़गा, कानून तो अपना काम आगे भी करता रहेगा । तमाम स्टाम्प पेपर, ग्रीन पेपर, शपथ-पत्र, करारनामे आदि "लीगल" पेपर पर ही क्यों, और कोढ़ मे खाज यह कि अधिकतर कागज (रजिस्ट्री वगैरह छोड़कर) पीछे तरफ़ से कोरे होते हैं, अर्थात उस कीमती कागज की एक बाजू तो बेकार ही छोड़ दी जाती है । ऐसा क्यों ?

क्या कागज के दोनों तरफ़ टाईप करने या फ़ोटोकॉपी करने से कानूनी दलील कमजोर हो जायेगी ? या किसी धारा का उल्लंघन हो जायेगा ? फ़िर यह राष्ट्रीय अपव्यय क्यों ? उच्चतम न्यायालय इस बात की व्यवस्था कर सकते हैं कि जो भी न्यायालयीन कागज एक तरफ़ से कोरा हो उस पर अगला पृष्ठ लगातार टाईप किया जाये, जरा सोचिये हमारी अदालतों मे लाखों केस लम्बित हैं उनमें कितना कागज बेकार गया होगा और इस विधि से भविष्य में हम कितना कागज बचा सकते हैं ।

ठीक इसी प्रकार का मामला अकादमिक क्षेत्रों में कागज के दुरुपयोग का है । भारत के तमाम विश्वविद्यालयों, संस्थानों, शोध प्रतिष्ठानों, महविद्यालयों आदि में पीएच.डी., एम.फ़िल., एम.एससी., लघु शोध प्रबन्ध आदि ऐसे हजारों अकादमिक कार्य चलते रहते हैं जिसमें छात्र को अपनी रिपोर्ट या थेसिस या संक्षेपिका जमा करानी होती है वह भी एक नहीं चार-पाँच बल्कि सात-सात प्रतियों में (वह शोध कितना उपयोगी होता है, यह बहस का एक अलग विषय है)... मेरा सुझाव है कि सभी रिपोर्टों और थेसिस (Reports and Thesis) को कागज के दोनों ओर टाईप किया जाये, जाहिर है कि उनकी फ़ोटोकॉपी भी वैसी ही की जायेगी । अमूमन एक पीएच.डी. थेसिस कम से कम दो सौ पृष्ठों की तो होती ही है, उसकी सात प्रतियाँ अर्थात चौदह सौ कागज, यदि यही थेसिस दोनों ओर टाईप की जाये तो हम सीधे-सीधे सात सौ कागज एक थेसिस पर बचा लेते हैं.

कल्पना करें कि देश भर में चल रहे सभी थेसिस एवं रिपोर्टों को कागज के दोनो ओर टाईप करने से कितना कागज बचेगा (मतलब कितने पेड़ बचेंगे) । थेसिस को एक ही तरफ़ प्रिन्ट करने की शाही और अंग्रेजी प्रथा / परम्परा को तत्काल बन्द किया जाना चाहिये, क्योंकि अन्ततः मतलब तो उस थेसिस के निष्कर्षों से है, यदि शोध कार्य उत्कृष्ट है तो फ़िर इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वह कागज के एक ओर है या दोनों ओर । साथ ही यदि शोध कार्य घटिया है तो वह कितने भी चिकने और उम्दा कागज पर प्रिन्ट किया गया हो, घटिया ही रहेगा । सभी बडे़ विश्वविद्यालयों के कुलपति, कुलसचिव मिलबैठ कर तय कर लें कि सभी थेसिस एवं रिपोर्ट कागज के दोनों ओर टाईप की जायेंगी और स्वीकार की जायेंगी । उनका यह कार्य राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में याद किया जायेगा ।

देश में भयानक बेरोजगारी है, यह एक स्थापित तथ्य है, नौकरी के एक-एक पद के लिये सैकड़ों आवेदन दिये जाते हैं, जो कि समस्या को देखते हुए स्वाभाविक भी है, परन्तु कागज के अपव्यय का यह भी एक विडम्बनापूर्ण उदाहरण है, - एक समाचार पत्र में किसी पद का विज्ञापन प्रकाशित होता है, युवक अपनी सारी डिग्रियों की फ़ोटोकॉपी प्रत्येक आवेदन के साथ लगाते हैं (हाईस्कूल से लेकर पीएच.डी. और नेट/स्लेट तक की) ऐसा वह प्रत्येक आवेदन के साथ करता है, अर्थात कागज के अनावश्यक दुरुपयोग के साथ ही बेरोजगार पर फ़ोटोकॉपी के ढेर का आर्थिक बोझ भी । मेरा सुझाव है कि सरकारें (केन्द्र और राज्य) प्रत्येक जिले, तहसील, गाँव में सक्षम प्राधिकारी को अधिकृत करें, जो कि बेरोजगारों के सभी मूल प्रमाणपत्रों को एक बार देखकर, उनकी जाँच करके एक "कार्ड" जारी करें, जिसमें उस युवक की तमाम उपाधियों का उल्लेख हो, जिस प्रकार परिवहन विभाग सारे कागज जाँच कर "यलो कार्ड" जारी करता है, उसी तर्ज पर ।

युवक आवेदन पत्र के साथ सिर्फ़ वह कार्ड या उसकी छायाप्रति लगाये, जब उसका चयन इंटरव्यू के लिये हो जाये तभी वह नियोक्ता के समक्ष अपने मूल प्रमाणपत्रों के साथ हाजिर हो जाये । आवेदक वैसे भी अपनी सभी शैक्षणिक गतिविधियों का उल्लेख अपने बायो-डाटा में तो करता ही है, फ़िर सभी की फ़ोटोकॉपी लगाने की क्या आवश्यकता है ? क्योंकि एक पद के लिये चार-पाँच सौ आवेदन आना तो मामूली बात है, उनमें से चार-पाँच उम्मीदवार जो कि इंटरव्यू के लिये चुने जाने हैं, के अलावा बाकी के सारे कागज तो रद्दी की टोकरी में ही जाने हैं, यह कागज का भीषण अपव्यय तो है ही, बेरोजगारों के साथ अमानवीयता भी है ।

कम्प्यूटरीकरण के पश्चात अलबत्ता कागजों के उपयोग में कमी आई है, लेकिन उसे उल्लेखनीय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बैंकों में भी कम्प्यूटरीकरण के बावजूद सभी रिकॉर्ड के प्रिन्ट आऊट कागजों पर भी लेने की परम्परा (सुरक्षा की दृष्टि से) जारी है, फ़िर क्या विशेष फ़ायदा हुआ ? रोज शाम को दिन भर के "ट्रांजेक्शन" का प्रिन्ट आऊट लो, उसे सम्भालकर रखो, उसका बैक-अप कैसेट भी बनाओ फ़िर और सुरक्षा के लिये उसकी एक कॉपी भी रखो... यह सब क्या है ? क्या तकनीक बढने से कागज के उपभोग में कमी आई है ? जर्मनी में बडे़ से बड़ा अफ़सर भी कागज की छोटी-छोटी पर्चियों पर अपना सन्देश लिखकर देते हैं । हमारे यहाँ चार पंक्ति की मामूली सी "नोटशीट" के लिये पूरा का पूरा "ए४" कागजक्यों लिया जाये ? लेकिन क्या सरकारी कर्मचारी (दामाद) और क्या प्राईवेट सभी जगह क्लर्क हों या अफ़सर "माले-मुफ़्त दिल-ए-बेरहम" की तर्ज पर कागज का दुरुपयोग करते फ़िरते हैं, क्या यह राष्ट्रीय अपराध की श्रेणी में नहीं आता ?

इसीलिये अब समय आ गया है कि हम कागज को भी "राष्ट्रीय सम्पत्ति" घोषित कर दें, और उसके सही इस्तेमाल हेतु एक जनजागरण अभियान चलाया जाये । लोगों को शिक्षित किया जाये कि किस तरह से कम से कम कागज में अपना काम निकाला जाये, इसके लिये सरकार के साथ सामाजिक संगठनों, प्रिन्ट मीडिया और महत्वपूर्ण व्यक्तियों को आगे आकर उदाहरण पेश करना होगा ।

आप आपके घर में पड़े हुवे वेस्ट कागज, बुक और न्यूज पेपर आदि को कचरे में न डाले, उस को आप किशी वेस्ट पेपर लेनेवाले की दुकान पर दे दीजिए, जिशसे आपके वेस्ट पेपर का भी उपयोग हो जायेगा और आपको कुछ पैशे भी मिलेंगे

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श्रीमद भागवत गीता हिंदी मे।

गीता सुनने के बाद अगर आप के मन में श्रीमद भागवत गीता के बारे में कोई भी सवाल हो तो आप निसकोच पुच सकते है आप के पूछे गए सवाल का जवाब जल्दी देने की पूरी कोसिस करूँगा।

अगर आप का इन्टरनेट की स्पीड धीमी है तो भी आप गीता सुन सकते है क्योंकी इसकी स्पीड कम की हुवी है जिस से आप लोग सही तरह से सुन सके।

जय श्री कृष्णा... जय हिन्द

Posted by Unknown Saturday, September 12, 2015 0 comments