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Chini Yatri ki Chanakya se Mulakat in Hindi
Chanakya Story in Hindi

Chini Yatri ki Chanakya se Mulakat in Hindi

जब चीनी यात्री चाणक्य से मिला


घटना उन दिनों की है जब भारत पर चंद्रगुप्त मौर्य का शासन था और आचार्य चाणक्य यहाँ के महामंत्री थे और चन्द्रगुप्त के गुरु भी थे उन्हीं के बदौलत चन्द्रगुप्त ने भारत की सत्ता हासिल की थी.
चाणक्य अपनी योग्यता और कर्तव्यपालन के लिए देश विदेश मे प्रसिद्ध थे उन दिनों एक चीनी यात्री भारत आया यहाँ घूमता फिरता जब वह पाटलीपुत्र पहुंचा तो उसकी इच्छा चाणक्य से मिलने की हुई उनसे मिले बिना उसे अपनी भारत यात्रा अधूरी महसूस हुई. पाटलिपुत्र उन दिनों मौर्य वंश की राजधानी थी. वहीं चाणक्य और सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य भी रहते थे लेकिन उनके रहने का पता उस यात्री को नहीं था लिहाजा पाटलिपुत्र मे सुबह घूमता-फिरता वह गंगा किनारे पहुँचा.
 
यहाँ उसने एक वृद्ध को देखा जो स्नान करके अब अपनी धोती धो रहा था. वह साँवले रंग का साधारण व्यक्ति लग रहा था लेकिन उसके चहरे पर गंभीरता थी उसके लौटने की प्रतीक्षा मे यात्री एक तरफ खड़ा हो गया वृद्ध ने धोती धो कर अपने घड़े मे पनी भरा और वहाँ से चल दिया. जैसे ही यह यात्री के नजदीक पहुंचा यात्री ने आगे बढ़कर भारतीय शैली मे हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और बोला , “महाशय मैं चीन का निवासी हूँ भारत मे काफी घूमा हूँ यहाँ के महामंत्री आचार्य चाणक्य के दर्शन करना चाहता हूँ. क्या आप मुझे उनसे मिलने का पता बता पाएंगे?” वृद्ध ने यात्री का प्रणाम स्वीकार किया और आशीर्वाद दिया. फिर उस पर एक नज़र डालते हुये बोला, “अतिथि की सहायता करके मुझे प्रसन्नता होगी आप कृपया मेरे साथ चले.”
 
फिर आगे-आगे वह वृद्ध और पीछे-पीछे वह यात्री चल दिये. वह रास्ता नगर की ओर न जा कर जंगल की ओर जा रहा था. यात्री को आशंका हुई की वह वृद्ध उसे किसी गलत स्थान पर तो नहीं ले जा रहा है. फिर भी उस वृद्ध की नाराजकी के डर से कुछ कह नहीं पाया. वृद्ध के चहरे पर गंभीरता और तेज़ था की चीनी यात्री उसके सामने खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था. उसे इस बात की भली भांति जानकारी थी की भारत मे अतिथियों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाता है और सम्पूर्ण भारत मे चाणक्य और सम्राट चन्द्रगुप्त का इतना दबदबा था की कोई अपराध करने की हिम्मत नहीं कर सकता था, इसलिए वह अपनी सुरक्षा की प्रति निश्चिंत था.
 
वह यही सोच रहा था की चाणक्य के निवास स्थान मे पहुँचने के लिए ये छोटा मार्ग होगा. वृद्ध लंबे- लंबे डग भरते हुये काफी तेजी से चल रहा था चीनी यात्री को उसके साथ चलने मे काफी दिक्कत हो रही थी. नतीजन वह पिछड़ने लगा. वृद्ध को उस यात्री की परेशानी समझ गयी व धीरे-धीरे चलने लगा. अब चीनी यात्री आराम से उसके साथ चलने लगा. रास्ता भर वे खामोसी से आगे बढ़ते रहे.
 
थोड़ी देर बाद वृद्ध एक आश्रम से निकट पहुंचा जहां चारों ओर शांति थी तरह- तरह के फूल पत्तियों से से आश्रम घिरा हुआ था. वृद्ध वहाँ पहुंच कर रुका और यात्री को वहीं थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के लिए कह कर आश्रम मे चला गया.
 
यात्री सोचने लगा की वह वृद्ध शायद इसी आश्रम मे रहता होगा और अब पानी का घड़ा और भीगे वस्त्र रख कर कहीं आगे चलेगा.
 
कुछ क्षण बाद यात्री से सुना , “महामंत्री चाणक्य अपने अतिथि का स्वागत करते है. पधारिए महाशय ”
 
यात्री ने नज़रे उठाई और देखता रह गया वही वृद्ध आश्रम के द्वार पर खड़ा उसका स्वागत कर रहा था. उसके मुंह से आश्चर्य से निकाल पड़ा “आप?”
 
“हाँ महाशय” वृद्ध बोला “मैं ही महामंत्री चाणक्य हूँ और यही मेरा निवास स्थान है. आप निश्चिंत होकर आश्रम मे पधारे.”
 
यात्री ने आश्रम मे प्रवेश किया लेकिन उसके मन में याद आशंका बनी रही कि कहीं उसे मूर्ख तो नही बनाया जा रहा है. वह इस बात पर यकीन ही नहीं कर पा रहा था कि एक महामंत्री इतनी सादगी का जीवन व्यतीत करता है. नदी पर अकेले ही पैदल स्नान के लिए जाना. वहाँ से स्वयं ही अपने वस्त्र धोना, घड़ा भर कर लाना और बस्ती से दूर आश्रम मे रहना, यह सब चाणक्य जैसे विश्वप्रसिद्ध व्यक्ति कि ही दिनचर्या है.
 
उस ने आश्रम मे इधर उधर देखा. साधारण किस्म का समान था. एक कोने मे उपलों का ढेर लगा हुआ था. वस्त्र सुखाने के लिए बांस टंगा हुआ था. दूसरी तरफ मसाला पीसने के लिए सील बट्टा रखा हुआ था. कहीं कोई राजसी ठाट-बाट नहीं था.
 
चाणक्य ने यात्री को अपनी कुटियाँ मे ले जाकर आदर सहित आसान पर बैठाया और स्वयं उसके सामने दूसरे आसान पर बैठ गए.
 
यात्री के चेहरे पर बिखरे हुए भाव समझते हुये चाणक्य बोले, “महाशय, शायद आप विश्वास नहीं कर पा रहे है कि, इस विशाल राज्य का महामंत्री मैं ही हूँ तथा यह आश्रम ही महामंत्री का मूल निवास स्थान है. विश्वास कीजिये ये दोनों ही बातें सच है. शायद आप भूल रहे है कि आप भारत मे है जहां कर्तव्यपालन को महत्व दिया जा रहा है, ऊपरी आडंबर को नहीं, यदि आपको राजशी ठाट-बाट देखना है तो आप सम्राट के निवास स्थान पर पधारे, राज्य का स्वामी और उसका प्रतीक सम्राट होता है, महामंत्री नहीं”.
 
चाणक्य कि बाते सुन कर चीनी यात्री को खुद पर बहुत लज्जा आयी कि उसने व्यर्थ ही चाणक्य और उनके निवास स्थान के बारे मे शंका कि. इत्तेफाक से उसे समय वहाँ सम्राट चन्द्रगुप्त अपने कुछ कर्मचारियों के साथ आ गए. उन्होने अपने गुरु के पैर छूये और कहा, “गुरुदेव राजकार्य के संबंध मे आप से कुछ सलाह लेनी थी इसलिए उपस्थित हुआ हूँ.
 
इस पर चाणक्य ने आशीर्वाद देते हुये कहा, “उस संबंध मे हम फिर कभी बात कर लेंगे अभी तो तुम हमारे 
अतिथि से मिलो, यह चीनी यात्री हैं. इन्हे तुम अपने राजमहल ले जाओ. इनका भली-भांति स्वागत करो और फिर संध्या को भोजन के बाद इन्हे मेरे पास ले आना, तब इनसे बातें करेंगे”.
 
सम्राट चन्द्रगुप्त आचार्य को प्रणाम करके यात्री को अपने साथ ले कर लौट गए.
 
संध्या को चाणक्य किसी राजकीय विषय पर चिंतन करते हुये कुछ लिखने मे व्यस्त थे. सामने ही दीपक जल रहा था. चीनी यात्री ने चाणक्य को प्रणाम किया और एक ओर बिछे आसान पर बैठ गया.
 
चाणक्य ने अपनी लेखन सामग्री एक ओर रख दी और दीपक बुझा कर दूसरा दीपक जला दिया. इस के बाद चीनी यात्री को संबोधित करते हुये बोले, “महाशय, हमारे देश मे आप काफी घूमे-फिरे है. कैसा लगा आप को यह देश?”
 
चीनी यात्री ने नम्रता से बोला, “आचार्य, मैं इस देश के वातावरण और निवासियों से बहुत प्रभावित हुआ हूँ. लेकिन यहाँ पर मैंने ऐसी अनेक विचित्रताएं भी देखीं हैं जो मेरी समझ से परे है”.
“कौन सी विचित्रताएं, मित्र?” चाणक्य ने स्नेह से पूछा.
 
“उदाहरण के लिए सादगी की ही बात कर ली जा सकती है. इतने बड़े राज्य के महामन्त्री का जीवन इतनी सादगी भरा होगा, इस की तो कल्पना भी हम विदेशी नहीं कर सकते,” कह कर चीनी यात्री ने अपनी बात आगे बढ़ाई,
 
“अभी अभी एक और विचित्रता मैंने देखी है आचार्य, आज्ञा हो तो कहूँ?”
“अवश्य कहो मित्र, आपका संकेत कौन सी विचित्रता से की ओर है?”
 
“अभी अभी मैं जब आया तो आप एक दीपक की रोशनी मे काम कर रहे थे. मेरे आने के बाद उस दीपक को बुझा कर दूसरा दीपक जला दिया. मुझे तो दोनों दीपक एक समान लगे रहे है. फिर एक को बुझा कर दूसरे को जलाने का रहस्य मुझे समझ नहीं आया?”
 
आचार्य चाणक्य मंदमंद मुस्कुरा कर बोले इसमे ना तो कोई रहस्य है और ना विचित्रता. इन 2 दीपको मे से एक राजकोष का तेल है और दूसरे मे मेरे अपने परिश्रम से खरीदा गया तेल. जब आप यहाँ आए थे तो मैं राजकीय कार्य कर रहा था इसलिए उस समय राजकोष के तेल वाला दीपक जला रहा था. इस समय मैं आपसे व्यक्तिगत बाते कर रहा हूँ इसलिए राजकोष के तेल वाला दीपक जलना उचित और न्यायसंगत नहीं है. लिहाज मैंने वो वाला दीपक बुझा कर अपनी आमनी वाला दीपक जला दिया”.
 
चाणक्य की बात सुन कर यात्री दंग रह गया और बोला, “धन्य हो आचार्य, भारत की प्रगति और उसके विश्वगुरु बनने का रहस्य अब मुझे समझ मे आ गया है. जब तक यहाँ के लोगो का चरित्र इतना ही उन्नत और महान बना रहेगा, उस देश की तरक्की को संसार की कोई भी शक्ति नहीं रोक सकेगी. इस देश की यात्रा करके और आप जैसे महात्मा से मिल कर मैं खुद को गौरवशाली महसूस कर रहा हूँ.

Posted by Unknown Tuesday, October 6, 2015 0 comments


ये चित्र 'जौहरकुण्ड' का है....॥

'जौहर' एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनकर हमारी रुह कांप जाती है, परन्तु उसके साथ ही साथ यह शब्द राजस्थानी क्षत्राणियोँ के अभूतपूर्व बलिदान का स्मरण कराता हैँ! जब किसी राजस्थानी राजा के राज्य पर मुस्लिम आक्रमणकारीयोँ का आक्रमण होता तो युध्द मेँ जीत की कोई संम्भावना ना देखकर राजस्थानी क्षत्रिय और क्षत्राणी आत्म समर्पण करने के बजाय लड़कर मरना अपना धर्म समझते थे! क्योकिँ कहा जाता है ना "वीर अपनी मृत्यु स्वयं चुनते है!" इसिलिए राजस्थानी वीर और वीरांगनाए भी आत्मसमर्पण के बजाय साका (साका= केसरिया+जौहर) का मार्ग अपनाते थे! पुरुष (क्षत्रिय) 'केसरिया' वस्त्र धारणा कर प्राणोँ का उत्सर्ग करने हेतु 'रण भूमि' मेँ उतर जाते थे! और राजमहल की महिलाँए (क्षत्रणियाँ) अपनी 'सतीत्व की रक्षा' हेतु अपनी जीवन लीला समाप्त करने हेतु जौहर कर लेती थी!

महिलाँए एसा इसलिए करती थी क्योँकि मुस्लिम आक्रमणकारी युध्द मेँ विजय के पश्चात महिलाओँ के साथ बलात्कार करते थे! अत: क्षत्राणी विरांगनाएँ अपनी अस्मिता व गौरव की रक्षा हेतु जौहर का मार्ग अपनाती थी जिसमेँ वे जौहर कुण्ड मेँ अग्नि प्रज्जवलित कर धधकती अग्नि कुण्ड मेँ कुद कर अपने प्रणोँ की आहुती दे देती थी!! जौहर के मार्ग को एक क्षत्राणी अपना गौरव व अपना अधिकार मानती थी! और यह मार्ग उनके लिए स्वाधिनता व आत्मसम्मान का प्रतिक था! ये जौहर कुण्ड एसी ही हजारोँ वीरांगनाओ के बलिदान का साक्ष्य हैँ!

नमन हे एसी क्षत्राणी विरांगनाओँ को... और गर्व है हमेँ हमारे गौरवपूर्ण इतिहास पर...

गर्व से कहो हम हिन्दु है...॥ जय जय राजस्थान....जय माँ भारती...!!

Posted by Unknown Tuesday, October 29, 2013 0 comments

Acharya Kanad - Founder of Atomic Theory

Acharya Kanad - Founder of Atomic Theory

As the founder of "Vaisheshik Darshan"- one of six principal philosophies of India - Acharya Kanad was a genius in philosophy. He was the pioneer expounder of realism, law of causation and the atomic theory. He has classified all the objects of creation into nine elements, namely: earth, water, light, wind, ether, time, space, mind and soul.

He says, "Every object of creation is made of atoms which in turn connect with each other to form molecules."

His statement ushered in the Atomic Theory {Conception of Anu (Atom)} for the first time ever in the world, nearly 2500 years before John Dalton. Kanad has also described the dimension and motion of atoms and their chemical reactions with each other. Compared to the world's other scientists, Kanad and other Indian scientists were the global masters of this field.

Posted by Unknown Monday, June 17, 2013 0 comments

Hinduism and Science

Hinduism and Science

Professor Arthur Holmes (1895-1965) geologist, professor at the University of Durham. He writes regarding the age of the earth in his great book, The Age of Earth (1913) as follows:

"Long before it became a scientific aspiration to estimate the age of the earth, many elaborate systems of the world chronology had been devised by the sages of antiquity. The most remarkable of these occult time-scales is that of the ancient Hindus, whose astonishing concept of the Earth's duration has been traced back to Manusmriti, a sacred book."

When the Hindu calculation of the present age of the earth and the expanding universe could make Professor Holmes so astonished, the precision with which the Hindu calculation regarding the age of the entire Universe was made would make any man spellbound.

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स्वर्ग से पृथ्वी पर गंगा के अवतरण की कहानी

स्वर्ग से पृथ्वी पर गंगा के अवतरण की कहानी...

गंगा के अवतरण की एक पौराणिक कथा बड़ी प्रचलित है । भगीरथ ने स्वर्ग में बहने वाली गंगा के प्रवाह को पृथ्वी पर लाया । भगीरथ की कथा सभी जानते हैं । एक महाराजा सगर थे । पुराण बताते हैं कि कपिल मुनि के शाप के कारण महाराज सगर के साठ हजार पुत्र जलकर भस्म हो गए । ऋषि से पूछा कि उनका उद्धार कैसे होगा ? तो उन्होंने बताया कि स्वर्ग में बहने वाली नदी गंगा है, उसका पानी यहाँ आएगा, उसका स्पर्श अगर इनको होगा तो उनका उद्धार हो जाएगा । सगर महाराज तो चले गए । फिर उनके पुत्र अंशुमान ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए तपस्या की । लेकिन सफलता नहीं मिली । अंशुमान के पुत्र यानि सगर महाराज के पौत्र भगीरथ थे । उन्होंने तपस्या की और स्वर्ग से गंगा को वे पृथ्वी पर ले आए । कहते हैं कि बीच में शंकर की जटा में गंगा उलझ गई थी । तो वहाँ से इसे निकाला । जन्हु नाम के एक ऋषि की टांग में फँस गई । तो वहाँ सेंध लगाकर उसको बाहर निकाला तबसे गंगा पृथ्वी पर बह रही है ।

पुराण की कथाएँ साधारणतः रुपक कथाएँ होती हैं । इस रूपक कथा का मतलब क्या है ? गंगा स्वर्ग में बहती थी, यानि कहाँ बहती थी ? वह तिब्बत में बहती थी । जैसे आज ‘ब्रह्मपुत्र’ बहता है । आधा ब्रह्मपुत्र यानि करीब ९०० मील वह तिब्बत में बहता है, जिसके पानी का कोई उपयोग नहीं है । बर्फ ही बर्फ है । बाद में असम होकर भारत में आता है । गंगा तो पूरी की पूरी तिब्बत में से बहती होगी । तिब्बत का ही पुराना नाम ‘त्रिविष्टप्’ है जिसका एक अर्थ संस्कृत में, ‘स्वर्ग’ भी होता है । अब सगर के ६० हजार पुत्रों का अर्थ क्या है ? सगर राजा के राज्यकाल में अकाल पड़ा होगा । ऐसा कहते हैं कि जब आकाश में कपिल नक्षत्र का उदय होता है तब अकाल आ जाता है, पानी नहीं बरसता । लोग मरते हैं । उस अकाल में साठ हजार लोग मर गए । राजा प्रजा का पिता होता है । प्रजा का अर्थ समाज भी है । “प्रजा स्यात् सन्ततौ जने” ऐसा शब्दकोश में बताया है । ६०,००० लोग मर गए । भगीरथ ने देखा कि गंगा का जल आएगा कैसे ? तपस्या की । इंजीनियरिंग स्किल या अभियंता की उद्यमशीलता ने एक बिन्दु खोज निकाला । जिसको तोड़ने से गंगा का सारा पानी इस ओर आया । बहुत वेग से आया । कहते हैं शंकर ने जटा में धारण किया । मतलब पहाड़ियों में पानी उलझ गया । उसमें से निकला । पता नहीं कब सगर महाराज हो गए, कब भगीरथ हो गया । लेकिन आज तक जहाँ उत्तरप्रदेश, बिहार में गंगा बहती है वहाँ अकाल नहीं होता ।

रूपक शब्द युग्म
स्वर्ग - त्रिविष्टप् (तिब्बत)
(साठ हज़ार) पुत्र - (साठ हज़ार) प्रजा
(भगीरथ की) तपस्या - (भगीरथ की सतत) उद्यमशीलता
शंकर की जटा - हिमालय की पहाड़ियां
कपिल मुनि - कपिल नक्षत्र
(कपिल मुनि का) शाप - (कपिल नक्षत्र का) प्रभाव
साठ हज़ार पुत्र जलकर भस्म - साठ हज़ार प्रजा की अकाल से मृत्यु

पिछले एक सहस्त्र वर्षों की पराधीनता के कारण हम पौराणिक कथाओं के भाव को नहीं समझ पाए । समय की मांग है कि हम इन कथाओं से सही अर्थ को समझें और भगीरथ के ही तरह अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार समाज कल्याण के लिए सतत् लगे रहें ।

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समय और आकाश (दूरी) की इकाई

समय और आकाश का हमारे तत्वदर्शी ऋषियों ने बहुत ही सूक्ष्म परिमाण निश्चित किया है |

पाश्चात्य में सेकंड को समय का सबसे सूक्ष्म अंश मन गया है पर हमारे ऋषियों ने त्रुति का परिमाण माना है जो सेकंड का १/३३७५०वां अंश है |

इसी प्रकार पाश्चात्य में लम्बाई/दूरी नापने का सबसे सूक्ष्म परिमाण इंच है पर हमारे ऋषियों ने त्रसरैणु का परिमाण माना है जो इंच का १/३४६५२५वां हिस्सा है |

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Hathor Goddess

 About Hathor Goddess

अत्यन्त प्राचीनकाल से ही मिस्र देश में गाय-बैलों की पूजा होती चली आई है| मिश्रवासियों की प्रसिद्ध आराध्य-देवी `हथोर' गौ ही है| यहां की नील नदी की उपमा दुधारु गाय से दी जाती रही है| नील नदी के तट पर सात प्रकार के देवताओं की मूर्तियां स्थित है| जब इस नदी में बाढ़ आती है, तो इन देवताओं की पूजा की जाती है और गायों का एक विशाल जुलूस निकाल जाता है|

मिश्रवासी `हथोर' गौ के समान `आपिस' बैल की भी पूजा करते है| यहां होता है कि मिश्र की प्राचीन संस्कृति ईसा से लगभग पांच सहस्र वर्ष पूर्व विद्यमान थी तथा यहां गाय-बैलों की पूजा होती थी| मिश्र में गौहत्या पूर्णत: निषिद्ध थी| गौ-हत्यारों को प्राणदण्ड मिलता था| जिस प्रकार हिन्दुओं का विश्वास है कि मृत्यु के पश्चात् आत्मा गौकी पूंछ पकड़कर वैतरणी पार करती है, उसी प्रकार मिश्रवासियों के धर्मशास्त्र में लिखा है कि मृत प्राणी गौ की पूंछ पकड़कर नील नदी पार करता है| हिरोडोटस लिखता है कि मिश्रवासी बैलों का वध करते थे, किन्तु गौ की हत्या नहीं करते थे| उक्त तथ्यों से जान पड़ता है कि किसी सुदुर अतीतकाल में भारत के ही लोगों ने एशियाई देशों में होते हुए मिश्र तक पहुंचकर वहां अपनी संस्कृति का प्रसार किया था|

इतिहास की आदिम अवस्था में आयों के साम्राज्य का इतना विस्तार था कि कुछ भागों के अतिरिक्त समस्त यूरोप और सम्भवत: उत्तरी रूस का पर्याप्त साम्राज्य तथा एशिया में एशिया माइनर, काकेशिया, मीडिया, पर्शिया, भारत और मध्यवर्ती बेक्टीरिया तक समाविष्ट था| इस प्रकार अन्य देशों की भांति भारत और ईरान के पारस्परिक सम्बन्ध भी आर्यों के समय से ही हैं| `ईरान' शब्द `आर्याना' का अपभ्रंश माना जाता है| विद्धानों के मतानुसार सहस्रों वर्ष पूर्व ईरान भारतीय उपनिवेश ही था| प्राचीन मध्य प्रदेश में रहनेवाले `पर्सु' वंश के लोग बिलोचिस्तान के मार्ग से वर्तमान ईरान की भूमि पर पहुंचे और वहां `परशु' अथवा `पर्शु' नामक देश बसाया|


http://en.wikipedia.org/wiki/Hathor

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Howler Monkey Gods

 About Howler Monkey Gods

इस मूर्ति को देख कर भारतीय तुरंत पहचान गए होंगे की यह भगवान हनुमान की हे और यह मूर्ति किसी प्राचीन भारतीय मंदिर की जैसी प्रतीत होती है|

खैर, यह मूर्ति प्राचीन माया सभ्यता की हे, जिसे "Howler" के नाम से जाना जाता था| इसे मध्य अमेरिका के एक गणतंत्र होंडुरास में कोपन में खोजा गया था| यह मूर्ति लगभग 1500 साल पुरानी है|

यह भी दिलचस्प है कि "Howler" को भी पवन भगवान के रूप में जाना जाता था| हिंदू धर्म हनुमान में भी हनुमान को Vayuputra (पवन भगवान के पुत्र) और Pranavayu (जीवन की महत्वपूर्ण हवा) के रूप में जाना जाता है.

एक अन्य मूर्ति जो हनुमान की तरह दिखती है जिसे 'Wilka Huemana' कहा जाता है और 50 फीट लंबी 12 फीट चौड़ी है, ग्वाटेमाला के समीप खोजी गयी है|


http://en.wikipedia.org/wiki/Howler_Monkey_Gods

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Acharya Kapil - Father of Cosmology

Acharya Kapil - Father of Cosmology

Celebrated as the founder of Sankhya philosophy, Acharya Kapil is believed to have been born in 3000 BCE to the illustrious sage Kardam and Devhuti. He gifted the world with the Sankhya School of Thought. His pioneering work threw light on the nature and principles of the ultimate Soul (Purusha), primal matter (Prakruti) and creation.

His concept of transformation of energy and profound commentaries on atma, non-atma and the subtle elements of the cosmos places him in an elite class of master achievers - incomparable to the discoveries of other cosmologists. On his assertion that Prakruti, with the inspiration of Purusha, is the mother of cosmic creation and all energies, he contributed a new chapter in the science of cosmology. Because of his extrasensory observations and revelations on the secrets of creation, he is recognized and saluted as the Father of Cosmology.

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संस्कृत विश्व की सब से प्राचीन भाषा है तथा समस्त भारतीय भाषाओं की जननी है। संस्कृत काशाब्दिक अर्थ है परिपूर्ण भाषा। संस्कृत पू्र्णतया वैज्ञायानिक तथा सक्षम भाषा है। संस्कृत भाषा के व्याकरण नें विश्व भर के भाषा विशेषज्ञ्यों का ध्यानाकर्षण किया है तथा उन के मतानुसार भी यह भाषा कम्पयूटर के उपयोग के लिये सर्वोत्तम भाषा है। संस्कृत भाषा की लिपि देवनागरी लिपि है।

इस भाषा को ऋषि मुनियों ने मन्त्रों की रचना कि लिये चुना क्योंकि इस भाषा के शब्दों का उच्चारण मस्तिष्क में उचित स्पन्दन उत्पन्न करने के लिये अति प्रभावशाली था। इसी भाषा में वेद प्रगट हुये, तथा उपनिष्दों, रामायण, महाभारत और पुराणों की रचना की गयी। मानव इतिहास में संस्कृत का साहित्य सब से अधिक समृद्ध और सम्पन्न है।

संस्कृत भाषा में दर्शनशास्त्र, धर्मशास्त्र, विज्ञान, ललित कलायें, कामशास्त्र, संगीतशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, हस्त रेखा ज्ञान, खगोलशास्त्र, रसायनशास्त्र, गणित, युद्ध कला,कूटनिति तथा महाकाव्य, नाट्य शास्त्र आदि सभी विषयों पर मौलिक तथा विस्तरित गृन्थ रचे गये हैं। कोई भी विषय अनछुआ नहीं बचा। संस्कृत की गूंज कुछ साल बाद अंतरिक्ष में सुनाई दे सकती है। अमेरिका संस्कृत को ‘NASA’ की भाषा बनाने की कसरत में जुटा है क्योंकि संस्कृत ऐसी प्राकृतिक भाषा है जिसमें सूत्र के रूप में कंप्यूटर के जरिए कोई भी संदेश कम से कम शब्दों में भेजा जा सकता है।

रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी प्राचीन संस्कृत पुस्तकों से नई चीजों पर शोध और खोज कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के सामने अपने नाम से रख रहे हैं। दुनिया के 17 देशों में एक या अधिक संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी प्राप्तकरने के लिए जुटे हैं, लेकिन संस्कृत को समर्पित उसके वास्तविक अध्ययन के लिए एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय भारत में नहीं है। भारत की सरकार और लोगों को भी अब जागना चाहिए और अँग्रेजी की गुलामी से बाहर निकाल कर अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करना चाहिए।

भारत सरकार को भी ‘संस्कृत’ को नर्सरी से ही पाठ्यक्रम में शामिल करके देववाणी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाना चाहिए। केवल संस्कृत ही भारत के प्राचीन इतिहास तथा विज्ञान को वर्तमान से जोडने में सक्षम है। यदि हम भारत में संस्कृत की अवहेलना करते रहे तो हम अपने समूल को स्वयं ही नष्ट कर दें गे जो सृष्टि के निर्माण काल से वर्तमान तक की अटूट कडी है।और प्राचीन ऋषियों का ज्ञान संग्रहीत है, यानि हमारी ज्ञान धरोहर इसमें ही है! नहीं तो फिर हमें संस्कृत सीखने के लिये विदेशों में जाना पडे गा।

Posted by Unknown Friday, October 19, 2012 0 comments


विमान की शोध सबसे पहले हिन्दू ने की थी जानिए सबुत के साथ

अपने आप को भारतीय कहलाने वाले गर्व करो |

पाश्चात्य संस्कृति पर मरने वालो शर्म करो |

भारत के प्राचीन ग्रन्थों में आज से लगभग दस हजार वर्ष पूर्व विमानों तथा उन के युद्धों का विस्तरित वर्णन है। सैनिक क्षमताओं वाले विमानों के प्रयोग, विमानों की भिडन्त, तथा ऐक दूसरे विमान का अदृष्य होना और पीछा करना किसी आधुनिक वैज्ञिानिक उपन्यास का आभास देते हैं लेकिन वह कोरी कलपना नहीं यथार्थ है।

प्राचीन वामानों के प्रकार

प्राचीन विमानों की दो श्रेणिया इस प्रकार थीः-

मानव निर्मित विमान, जो आधुनिक विमानों की तरह पंखों के सहायता से उडान भरते थे।
आश्चर्य जनक विमान, जो मानव निर्मित नहीं थे किन्तु उन का आकार प्रकार आधुनिक ‘उडन तशतरियों’ के अनुरूप है।

विमान विकास के प्राचीन ग्रन्थ

भारतीय उल्लेख प्राचीन संस्कृत भाषा में सैंकडों की संख्या में उपलब्द्ध हैं, किन्तु खेद का विषय है कि उन्हें अभी तक किसी आधुनिक भाषा में अनुवादित ही नहीं किया गया। प्राचीन भारतीयों ने जिन विमानों का अविष्कार किया था उन्हों ने विमानों की संचलन प्रणाली तथा उन की देख भाल सम्बन्धी निर्देश भी संकलित किये थे, जो आज भी उपलब्द्ध हैं और उन में से कुछ का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया जा चुका है। विमान विज्ञान विषय पर कुछ मुख्य प्राचीन ग्रन्थों का ब्योरा इस प्रकार हैः-

1. ऋगवेद- इस आदि ग्रन्थ में कम से कम 200 बार विमानों के बारे में उल्लेख है। उन में तिमंजिला, त्रिभुज आकार के, तथा तिपहिये विमानों का उल्लेख है जिन्हे अश्विनों (वैज्ञिानिकों) ने बनाया था। उन में साधारणत्या तीन यात्री जा सकते थे। विमानों के निर्माण के लिये स्वर्ण, रजत तथा लोह धातु का प्रयोग किया गया था तथा उन के दोनो ओर पंख होते थे। वेदों में विमानों के कई आकार-प्रकार उल्लेखित किये गये हैं। अहनिहोत्र विमान के दो ईंजन तथा हस्तः विमान (हाथी की शक्ल का विमान) में दो से अधिक ईंजन होते थे। एक अन्य विमान का रुप किंग-फिशर पक्षी के अनुरूप था। इसी प्रकार कई अन्य जीवों के रूप वाले विमान थे। इस में कोई सन्देह नहीं कि बीसवीं सदी की तरह पहले भी मानवों ने उड़ने की प्रेरणा पक्षियों से ही ली होगी। याता-यात के लिये ऋग वेद में जिन विमानों का उल्लेख है वह इस प्रकार है-

जल-यान – यह वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद 6.58.3)
कारा – यह भी वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद 9.14.1)
त्रिताला – इस विमान का आकार तिमंजिला था। (ऋग वेद 3.14.1)
त्रिचक्र रथ – यह तिपहिया विमान आकाश में उड सकता था। (ऋग वेद 4.36.1)
वायु रथ – रथ की शकल का यह विमान गैस अथवा वायु की शक्ति से चलता था। (ऋग वेद 5.41.6)
विद्युत रथ – इस प्रकार का रथ विमान विद्युत की शक्ति से चलता था। (ऋग वेद 3.14.1).

2. यजुर्वेद में भी ऐक अन्य विमान का तथा उन की संचलन प्रणाली उल्लेख है जिस का निर्माण जुडवा अशविन कुमारों ने किया था। इस विमान के प्रयोग से उन्हो मे राजा भुज्यु को समुद्र में डूबने से बचाया था।

3. विमानिका शास्त्र –1875 ईसवी में भारत के ऐक मन्दिर में विमानिका शास्त्र ग्रंथ की ऐक प्रति मिली थी। इस ग्रन्थ को ईसा से 400 वर्ष पूर्व का बताया जाता है तथा ऋषि भारदूाज रचित माना जाता है। इस का अनुवाद अंग्रेज़ी भाषा में हो चुका है। इसी ग्रंथ में पूर्व के 97 अन्य विमानाचार्यों का वर्णन है तथा 20 ऐसी कृतियों का वर्णन है जो विमानों के आकार प्रकार के बारे में विस्तरित जानकारी देते हैं। खेद का विषय है कि इन में से कई अमूल्य कृतियाँ अब लुप्त हो चुकी हैं। इन ग्रन्थों के विषय इस प्रकार थेः-

विमान के संचलन के बारे में जानकारी, उडान के समय सुरक्षा सम्बन्धी जानकारी, तुफान तथा बिजली के आघात से विमान की सुरक्षा के उपाय, आवश्यक्ता पडने पर साधारण ईंधन के बदले सौर ऊर्जा पर विमान को चलाना आदि। इस से यह तथ्य भी स्पष्ट होता है कि इस विमान में ‘एन्टी ग्रेविटी’ क्षेत्र की यात्रा की क्षमता भी थी।

विमानिका शास्त्र में सौर ऊर्जा के माध्यम से विमान को उडाने के अतिरिक्त ऊर्जा को संचित रखने का विधान भी बताया गया है। ऐक विशेष प्रकार के शीशे की आठ नलियों में सौर ऊर्जा को एकत्रित किया जाता था जिस के विधान की पूरी जानकारी लिखित है किन्तु इस में से कई भाग अभी ठीक तरह से समझे नहीं गये हैं।
इस ग्रन्थ के आठ भाग हैं जिन में विस्तरित मानचित्रों से विमानों की बनावट के अतिरिक्त विमानों को अग्नि तथा टूटने से बचाव के तरीके भी लिखित हैं।

ग्रन्थ में 31 उपकरणों का वर्तान्त है तथा 16 धातुओं का उल्लेख है जो विमान निर्माण में प्रयोग की जाती हैं जो विमानों के निर्माण के लिये उपयुक्त मानी गयीं हैं क्यों कि वह सभी धातुयें गर्मी सहन करने की क्षमता रखती हैं और भार में हल्की हैं।

4. यन्त्र सर्वस्वः – यह ग्रन्थ भी ऋषि भारदूाजरचित है। इस के 40 भाग हैं जिन में से एक भाग ‘विमानिका प्रकरण’के आठ अध्याय, लगभग 100 विषय और 500 सूत्र हैं जिन में विमान विज्ञान का उल्लेख है। इस ग्रन्थ में ऋषि भारदूाजने विमानों को तीन श्रेऩियों में विभाजित किया हैः-

अन्तरदेशीय – जो ऐक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं।
अन्तरराष्ट्रीय – जो ऐक देश से दूसरे देश को जाते
अन्तीर्क्षय – जो ऐक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जाते

इन में सें अति-उल्लेखलीय सैनिक विमान थे जिन की विशेषतायें विस्तार पूर्वक लिखी गयी हैं और वह अति-आधुनिक साईंस फिक्शन लेखक को भी आश्चर्य चकित कर सकती हैं। उदाहरणार्थ सैनिक विमानों की विशेषतायें इस प्रकार की थीं-

पूर्णत्या अटूट, अग्नि से पूर्णत्या सुरक्षित, तथा आवश्यक्ता पडने पर पलक झपकने मात्र समय के अन्दर ही ऐक दम से स्थिर हो जाने में सक्ष्म।
शत्रु से अदृष्य हो जाने की क्षमता।
शत्रुओं के विमानों में होने वाले वार्तालाप तथा अन्य ध्वनियों को सुनने में सक्ष्म। शत्रु के विमान के भीतर से आने वाली आवाजों को तथा वहाँ के दृष्यों को रिकार्ड कर लेने की क्षमता।

शत्रु के विमान की दिशा तथा दशा का अनुमान लगाना और उस पर निगरानी रखना।
शत्रु के विमान के चालकों तथा यात्रियों को दीर्घ काल के लिये स्तब्द्ध कर देने की क्षमता।
निजि रुकावटों तथा स्तब्द्धता की दशा से उबरने की क्षमता।
आवश्यक्ता पडने पर स्वयं को नष्ट कर सकने की क्षमता।
चालकों तथा यात्रियों में मौसमानुसार अपने आप को बदल लेने की क्षमता।
स्वचालित तापमान नियन्त्रण करने की क्षमता।
हल्के तथा उष्णता ग्रहण कर सकने वाले धातुओं से निर्मित तथा आपने आकार को छोटा बडा करने, तथा अपने चलने की आवाजों को पूर्णत्या नियन्त्रित कर सकने में सक्ष्म।

विचार करने योग्य तथ्य है कि इस प्रकार का विमान अमेरिका के अति आधुनिक स्टेल्थ फाईटर और उडन तशतरी का मिश्रण ही हो सकता है। ऋषि भारदूाजकोई आधुनिक ‘फिक्शन राईटर’ नहीं थे परन्तुऐसे विमान की परिकल्पना करना ही आधुनिक बुद्धिजीवियों को चकित कर सकता है कि भारत के ऋषियों ने इस प्रकार के वैज्ञिानक माडल का विचार कैसे किया। उन्हों ने अंतरीक्ष जगत और अति-आधुनिक विमानों के बारे में लिखा जब कि विश्व के अन्य देश साधारण खेती बाडी का ज्ञान भी पूर्णत्या हासिल नहीं कर पाये थे।

5. समरांगनः सुत्रधारा – य़ह ग्रन्थ विमानों तथा उन से सम्बन्धित सभी विषयों के बारे में जानकारी देता है।इस के 230 पद्य विमानों के निर्माण, उडान, गति, सामान्य तथा आकस्माक उतरान एवम पक्षियों की दुर्घटनाओं के बारे में भी उल्लेख करते हैं।

लगभग सभी वैदिक ग्रन्थों में विमानों की बनावट त्रिभुज आकार की दिखायी गयी है। किन्तु इन ग्रन्थों में दिया गया आकार प्रकार पूर्णत्या स्पष्ट और सूक्ष्म है। कठिनाई केवल धातुओं को पहचानने में आती है।

समरांगनः सुत्रधारा के आनुसार सर्व प्रथम पाँच प्रकार के विमानों का निर्माण ब्रह्मा, विष्णु, यम, कुबेर तथा इन्द्र के लिये किया गया था। पश्चात अतिरिक्त विमान बनाये गये। चार मुख्य श्रेणियों का ब्योरा इस प्रकार हैः-

रुकमा – रुकमानौकीले आकार के और स्वर्ण रंग के थे।
सुन्दरः –सुन्दर राकेट की शक्ल तथा रजत युक्त थे।
त्रिपुरः –त्रिपुर तीन तल वाले थे।
शकुनः – शकुनः का आकार पक्षी के जैसा था।

दस अध्याय संलगित विषयों पर लिखे गये हैं जैसे कि विमान चालकों का परिशिक्षण, उडान के मार्ग, विमानों के कल-पुरज़े, उपकरण, चालकों एवम यात्रियों के परिधान तथा लम्बी विमान यात्रा के समय भोजन किस प्रकार का होना चाहिये।

ग्रन्थ में धातुओं को साफ करने की विधि, उस के लिये प्रयोग करने वाले द्रव्य, अम्ल जैसे कि नींबु अथवा सेब या कोई अन्य रसायन, विमान में प्रयोग किये जाने वाले तेल तथा तापमान आदि के विषयों पर भी लिखा गया है।

सात प्रकार के ईजनों का वर्णन किया गया है तथा उन का किस विशिष्ट उद्देष्य के लिये प्रयोग करना चाहिये तथा कितनी ऊचाई पर उस का प्रयोग सफल और उत्तम होगा। सारांश यह कि प्रत्येक विषय पर तकनीकी और प्रयोगात्मक जानकारी उपलब्द्ध है। विमान आधुनिक हेलीकोपटरों की तरह सीधे ऊची उडान भरने तथा उतरने के लिये, आगे पीछ तथा तिरछा चलने में भी सक्ष्म बताये गये हैं

6. कथा सरित-सागर – यह ग्रन्थ उच्च कोटि के श्रमिकों का उल्लेख करता है जैसे कि काष्ठ का काम करने वाले जिन्हें राज्यधर और प्राणधर कहा जाता था। यह समुद्र पार करने के लिये भी रथों का निर्माण करते थे तथा एक सहस्त्र यात्रियों को ले कर उडने वालो विमानों को बना सकते थे। यह रथ-विमान मन की गति के समान चलते थे।

कोटिल्लय के अर्थ शास्त्र में अन्य कारीगरों के अतिरिक्त सोविकाओं का उल्लेख है जो विमानों को आकाश में उडाते थे । कोटिल्लय ने उन के लिये विशिष्ट शब्द आकाश युद्धिनाह का प्रयोग किया है जिस का अर्थ है आकाश में युद्ध करने वाला (फाईटर-पायलेट) आकाश रथ, चाहे वह किसी भी आकार के हों का उल्लेख सम्राट अशोक के आलेखों में भी किया गया है जो उस के काल 256-237 ईसा पूर्व में लगाये गये थे।

उपरोक्त तथ्यों को केवल कोरी कल्पना कह कर नकारा नहीं जा सकता क्यों कल्पना को भी आधार के लिये किसी ठोस धरातल की जरूरत होती है। क्या विश्व में अन्य किसी देश के साहित्य में इस विषयों पर प्राचीन ग्रंथ हैं ? आज तकनीक ने भारत की उन्हीं प्राचीन ‘कल्पनाओं’ को हमारे सामने पुनः साकार कर के दिखाया है, मगर विदेशों में या तो परियों और ‘ऐंजिलों’ को बाहों पर उगे पंखों के सहारे से उडते दिखाया जाता रहा है या किसी सिंदबाद को कोई बाज उठा कर ले जाता है, तो कोई ‘गुलफाम’ उडने वाले घोडे पर सवार हो कर किसी ‘सब्ज परी’ को किसी जिन्न के उडते हुये कालीन से नीचे उतार कर बचा लेता है और फिर ऊँट पर बैठा कर रेगिस्तान में बने महल में वापिस छोड देता है। इन्हें कल्पना नहीं, ‘फैंटेसी’ कहते हैं।

अपने आप को भारतीय कहलाने वाले गर्व करो |

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The First Nuclear Scientist of the World


The First Nuclear Scientist of the World

The great man who enlightened the scientific boundaries of life at ‘quantum level’, he was the first nuclear scientist of India perhaps the world’s first.

The modern nuclear epoch was started in 1929; Einstein, Neils Bohr, Enrico ferny, Villard and Oppenheimer led the world to the dawn of the nuclear epoch.

In spite of the great work of the modern world’s nuclear scientists, why should we call ‘Maharshi Kanad’, the pioneer of ‘Quantum Mechanics’?

The work span of ‘Maharshi Kanad’ is dated back to the second century. He was born in the ‘Prabhas’ region (old name). ‘Aacharya Soma Sharma’ was his guru.

He has briefly described his concepts of electron in his Darshan- Grantha… ‘Vaisheshik Darshan’. Many critics have written their opinions (Bhashya) about this –Darshan.

This is an abstract of the great man’s work…. We can say it as postulates of Kanad’s theory or Kanad’s thesis: -

Elements are formed due to the specific arrangement of electrons; he first introduced this concept. The fundamental material of element is the basic reason behind the activity and characteristic properties of ‘Karma’ (sequence of events without time limit).

All the substances originated from earth are made up of micro and indivisible particles called electrons. The electrons are in stable or non-vibratory motion and the reason behind their initial vibratory motion is unknown.

Atomic energy is created due to the chain of reaction of these electrons and this creates such vibrations in the element and creates destruction.

Electrons can be used to measure time. Electron is the smallest unit to measure time.
So we can conclude that use of electrons to measure time was defined before 1700 years in India

In terms of the ‘second’ i.e. unit of time, One electron is equal to 37967.75th part of second. i.e. 1 electron =1/37967.75 second. Specialty of Kanad is his research work was not limited only up to the element.

According to him, all the substances, which are originated from the Earth, are made up of the smallest and indivisible electrons.

Though electrons in all the substances are smallest, they are not indivisible. Accordingly, electrons in some substances are divisible and such divisible electrons are used in destruction.

Kanad said that, Human mind is also made up of fusion of electrons; this can give rise to brief research work.

Kanad defined ‘life’ as an organized form of atoms and molecules and ‘death’ as an unorganized form of those atoms and molecules.

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